शादी को बोझ ना बनाओ (भाग 3) – संगीता अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : ” अरे तो छोरा अपनी पसंद का चाहता भी है तो क्या गलत है पति है वो उसका होने वाला !” शांति देवी बोली।

” मांजी पति है मालिक नहीं कि मेरी बेटी सांस भी उसकी पसंद से ले उस लड़के ने मेरी बेटी को अपनी प्रॉपर्टी समझ लिया है जब मन करे उसे बुला ले जब मन करे उसे कुछ भी सुना दे वो जिससे चाहे उससे मेरी बेटी बात करे वो जो चाहे वही कुहू पहने शादी से पहले ये हाल है सोचो बाद में क्या होगा….उसने हमारे लिए अपने प्यार की कुर्बानी तक दे दी और बदले में उसे क्या दे रहे हम एक घुटन भरी जिंदगी ….क्या पता कल को कुहू ना जी पाए ऐसे लड़के के साथ … मैं अपनी बेटी को कफ़न में देखने की जगह खानदान की रुसवाई पसंद करूंगी !” शालिनी नम आंखो से बोली।

सिद्धांत जी को ये सब सुन एक धक्का सा लगा उनकी लाडली किस मानसिक तनाव से गुजर रही होगी शायद इसका अंदाजा होने लगा उन्हें वो बिना कुछ बोले बेटी के कमरे की तरफ बढ़ गए। पीछे पीछे शालिनी जी और शांति देवी भी चल दी

” पापा आप …!” दूसरी तरफ अनमनी सी लेटी कुहू के सिर पर जब उन्होंने हाथ फेरा तो पलट कर कुहू बोली।

” बेटा मुझे माफ़ कर दे मैं गलत था जो सोचता था बेटी अपनी पसंद की चीजों से खुश रहेगी ससुराल में भूल गया था रहना उसे इंसान के साथ है सामान के साथ नहीं !” सिद्धांत जी बोले।

” वो पापा ….ऐसा कुछ नहीं !” कुहू कभी पापा कभी मम्मी कभी दादी को देखते हुए बोली।

तभी सार्थक का फोन आया।सिद्धांत जी ने फोन स्पीकर पर कर दिया।

” हैलो कुहू पांच मिनट में तैयार हो जाओ मैं लेने आ रहा हूं तुमसे बात करनी है और हां तमीज के कपड़े पहन कर आना जरा !” सार्थक बोला।

” सार्थक मैं … मैं अभी नहीं आ सकती …!” पिता के इशारा करने पर उसने मना कर दिया।

” तुम मुझे मना कर रही हो अपने होने वाले पति को तुम्हारी इतनी हिम्मत ….चुपचाप जो कहा वो करो समझी मैने पूछा नहीं बताया है तुम्हे और हां सूट पहन कर आना ऐसा ना हो जींस टॉप पहन अपना एक्सपोज करो और हां पांच मिनट मतलब पांच मिनट समझी… !” सार्थक चिल्लाते हुए बोला।

” बरखुदार पति बने नहीं हो तब इतनी अकड़ बनकर क्या करोगे तुम ….कुहू नहीं आएगी ना ही उसे शादी करनी अब तुमसे समझे तुम !” गुस्से मे ये बोल सिद्धांत जी ने फोन काट दिया।

” पापा …!” कुहू हैरानी से पापा को देखते हुए बस इतना ही बोली उसकी आंखों में सार्थक का डर था जिसे देख सिद्धांत जी तड़प उठे।

” हां बेटा अब तेरी शादी में सब चीजों के साथ दूल्हा भी तेरी पसंद का ही होगा मैं गलत था जो खानदान की चिंता में अपनी बेटी की खुशियों को नजरंदाज कर रहा था भूल गया था मेरी बेटी ने मेरी गोद में आ मुझे पिता का दर्जा दिया था उसने अपना पहला कदम मेरी उंगली पकड़ कर बढ़ाया था उसकी हर सफलता में मैं उसके साथ था बिरादरी नहीं…….आज ही मैं सार्थक के यहां जा रिश्ता तोड़ आता हूं साथ ही उनकी दी चीजें भी वापिस कर आऊंगा तुम मेरी अभिषेक से बात करवाना मैं उसके माता पिता से मिलना चाहूंगा पहले !” सिद्धांत जी बेटी के सिर पर हाथ रख बोले।

कुहू रोते हुए पापा के गले लग गई।

दोस्तों आपके बच्चे सिर्फ आपके हैं खानदान के नहीं …उनके पैदा होने से लेकर उनके हर सपने को पूरा करने में आप उनके साथ थे खानदान नहीं इसलिए उन्हें समझिए जरूरी नहीं उनकी पसंद हर बार गलत ही हो। अगर वो आपका मान रखते हुए अपनी खुशियां भूल रहे हैं तो ये आपका भी फर्ज है कि आप उनके लिए सही फैसला लो । विवाह चाहे प्रेम हो या माँ बाप की पसंद का बच्चे तभी खुश रह सकते है जब वो उनके लिए बोझ ना बने वरना तो कितनी जिंदगियाँ तबाह हो जाती है। 

क्या आप भी मेरी सोच से इत्तेफाक रखते हैं?

आपकी दोस्त

संगीता अग्रवाल

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!