राजा साहब (भाग 6 ) – रश्मि प्रकाश

राजा साहब भागे भागे रज्जु की कोठी पर पहुँचे उनके पीछे पीछे हरिया भी सोना, सोहम और सोहा को ले आया था।

“ ये क्या बात हुई रज्जु एक दिन में ही तुमने जाने की बात कह दी.. ना पहले कुछ सुनने को तैयार हुई ना अब बस तुम्हें भागने की आदत है..!” राजा साहब आस पास कौन है कहाँ है सब भूल गए थे भावावेश में वो रज्जु का हाथ पकड़कर वही उसके पलंग के पास नीचे बैठ गंए

“ राजू अब तो बता दो वो कहाँ है… ज़िन्दा है ना… मैं तो उसे छोड़कर भाग ही गई थी.. !” रज्जु के इस सवाल पर आज राजा साहब चुप न रह सके

संतोष की ओर इशारा करते हुए बोले ,“ देख लो रज्जु वही है तेरी अमानत… मैंने बड़े प्यार से उसे बड़ा किया.. कभी पता ही नहीं चलने दिया रज्जु ।”

उसे मेरे पास ले आओ राजू मेरी साँसें बस शायद उसके लिए ही अटकी पड़ी हैं ।

राजा ने संतोष को आवाज़ दे कर बुलाया।

रज्जु संतोष को अपने पास बैठा कर हाथों से उसके चेहरे पर अपने हाथ फेरते हुए राजा की ओर एहसान की नज़रों से देखते देखते अपनी आँखों सदा के लिए मूंद ली।

“ रज्जु ”कह कर राजा साहब बिलख पड़े

कोई कुछ समझ नहीं पाया ये अचानक क्या हो गया ।

रज्जु सदा के लिए सबको छोड़ कर चली गई।

हरिया राजा साहब को सँभालते हुए बोला,“ लगता है इसकी साँसें तुम दोनों में ही अटकी हुई थी ।”

“ संतोष तुम चारों अम्मा के चरण स्पर्श करों।” हरिया ने कहा और सोना को बच्चों को बाहर ले जाने कहा



वहीं विष्णु चुपचाप खड़ा था समझ नहीं पा रहा था छोटी माँ के जाने से राजा साहब इतना क्यों रो रहे हैं…।

रज्जु को अंतिम विदाई देते वक़्त राजा साहब फफक पड़े।

मुखाग्नि देने के समय विष्णु के साथ राजा साहब ने संतोष को भी लगा दिया। संतोष ने सवालिया नज़रों से देखा तो धीमे से बोले,“ माँ की बहन है समझ ले माँ ही है ।”

सभी कार्यक्रम तक राजा साहब का पूरा परिवार रज्जु की कोठी पर ही रहे।

उसके बाद सब अपने घर आ गए। दो दिन बाद संतोष अपने परिवार के साथ शहर चला गया।

गाँव में राजा साहब और हरिया ही रह गए।

एक दिन राजा साहब ने हरिया से कहा,“ हरिया आज फिर उस नदी किनारे जाने का दिल कर रहा है चलो थोड़ा घूम आते हैं ।”

“ बाबू तुम अपनी सारी ज़िन्दगी बस दूसरों के लिए सोचते रहे एक बार अपने लिए सोच लेते… वो भी चली गई जिसके लिए तुम शहर छोड़कर आए।अब भाभी को जो वादा किया है साथ निभाने का वो ज़िन्दगी भर निभाना पड़ेगा।” कहकर हरिया राजा साहब के साथ दूर नदी की तरफ़ निकल गया

नदी के तट पर अब पहले जैसी शांति नहीं थी.. ..पहले उधर बहुत पेड़ पौधे थे अब उधर थोड़ी कटाई छँटाई हो गई थी… पर आज भी वो कदम्ब का पेड़ खड़ा था और उसके नीचे पत्थरों से बना चबूतरा भी जहां राजा साहब ,हरिया और रज्जु अपनी एक साल छोटी बहन कजली के साथ यहाँ आया करती थी ।

दोनों का गाँव अलग अलग था पर स्कूल एक ही था जो इस नदी के दूसरे छोर पर स्थित था। हरिया राजा साहब के बाबूजी के यहाँ काम करने वाले महेश काका का बेटा था उम्र में राजा साहब से छोटा था पर राजा साहब का पूरा अंध भक्त।



ये चारों अकसर स्कूल के बाद कुछ देर यहाँ आकर खेलते फिर अपने अपने घर चले जाते थे।

खेलते मिलते ना जाने कब राजा साहब को रज्जु धीरे धीरे पसंद आने लगी थी और कजली को राजा साहब पसंद आ रहें थे।

पर ये सब बातें कभी एक-दूसरे से कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी बस आँखों में सब समझ रहे थे पर ज़ुबान पर लगाम लगा रखा था।

एक दिन रज्जु और कजली स्कूल नहीं आई.. राजा के मन में बहुत सवाल उठने लगे। हरिया जो बस बस्ता लेकर स्कूल आता है पढ़ना तो कभी पसंद ही नहीं था उसको राजा साहब ने पता करने भेजा ।

“ बाबू वे सब नानी के गाँव चली गई है किसी ब्याह में शामिल होने।अब कब आएगी ये तो नहीं पता।” हरिया पता करके आ राजा साहब को बता दिया

लगभग दस दिन बाद रज्जु लौट कर आई …. अब रज्जु पहले की तरह चहक नहीं रहीं थी.. हमेशा कहीं खोई सी रहती थी राजा उससे बात करना चाहता तो वो छिटक कर दूर हो जाती।

“ कजली तेरी बहन को क्या हो गया ये ऐसी क्यों हो गई है?” राजा साहब ने पूछा

“ पता नहीं रज्जु दी शादी में बहुत खुश नज़र आ रही थी ,हम मौसी की शादी में गए थे वहाँ बारात में उनके तरफ से बहुत लड़के आए थे , ये ना जाने एक लड़के के साथ दिन भर घूमती रहती थी। विदाई के बाद हम भी मौसी के साथ उनके ससुराल गए थे ,उधर भी ये उसके साथ ही घूमती रहती थी ।” कजली ने रस्सी के झूले पर झूलते झूलते राजा साहब से कह दिया

कजली जो खुद राजा साहब के प्यार में रहती थी रज्जु के किए को ऐसे बयान कर रही थी जिससे राजा रज्जु पर ध्यान देना कम कर उसकी तरफ़ ध्यान देने लग जाए।

किसी लड़के के साथ… सुनकर राजा साहब का दिमाग़ उड़ गया… रज्जु को मैं पसंद नहीं हूँ ये बात उनके दिल में घर कर गई ।

राजा साहब (भाग 7 )

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राजा साहब (भाग 5 )

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