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पिता का प्रेम सौभाग्य से मिलता है। –  अर्चना खंडेलवाल

पापा मेरा परीक्षा परिणाम आ गया है, और अब मुझे आगे की डिग्री लेने विदेश जाना है, वहां बहुत अच्छे कॉलेज हैं, वहां से अगर मैंने एमबीए की डिग्री ले ली तो मेरा भविष्य बन जायेगा, नितिन ने उत्साहपूर्वक कहा।

तभी विदेश जाने की बात सुनकर सावित्री जी चौंक गई, बेटा क्या तेरी ये पढ़ाई यहां अपने देश में रहकर नहीं हो सकती है क्या? तुझे तो पता है हम तुझे कितनी मुश्किल से पढ़ा रहे हैं और विदेश जाने का तो खर्च भी बहुत आयेगा, और वहां की पढ़ाई तो और भी महंगी होगी।

मम्मी, आपको तो कुछ पता भी नहीं है, वहां की पढ़ाई कितनी महत्वपूर्ण है, एक बार वहां से पढ़ लिया तो मेरा जीवन संवर जायेगा, मैं जिंदगी में सफल हो जाऊंगा, मेरे बाकी दोस्त भी तो जा रहे हैं, तो मैं भी जाऊंगा, जब उनके मम्मी -पापा उन्हें वहां पढ़ने भेज सकते हैं तो आप भी तो भेज सकते हैं, मैं पापा से बात करूंगा, आप तो कभी पढ़ाई की महत्ता नहीं समझने वाली हो, आपको तो हमेशा पैसे और बस पैसे की ही चिंता लगी रहती है, अरे!! जब इतना पैसा पढ़ाई में लगाऐंगे तो वापस कमाऊंगा भी, नौकरी लग जायेगी तो इससे चार गुना कमाकर भी तो लाऊंगा, आप बहुत ज्यादा सोच रही हो।

मुझे यहां के कुंए का मेंढ़क बनकर नहीं जीना है, अपनी जिंदगी में मैं हर खुशी पाना चाहता हूं, हर ऊंचाई पर जाना चाहता हूं, मुझे अपनी जिंदगी से सिर्फ दो समय के खाने के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए, नितिन ने तेज आवाज में कहा।

गरम खून है फिर अभी उम्र भी तो है, इस उम्र में ही बच्चों को मां -बाप अपने दुश्मन दिखाई देते हैं, उनकी कही गईं हर बात का वो विरोध ही करते हैं।

ये कहकर महेश जी ने अपनी पत्नी सावित्री जी को समझाया, सावित्री जी ये ही सोच रही थी, यहां की पढ़ाई तक तो ठीक था पर महेश जी आगे की राशि का इंतजाम कैसे करेंगे? उन्होंने तो पहले ही बहुत कर्ज ले रखे हैं, लोगों से और बैंकों से लोन लेकर नितिन को पढ़ाया था। उनकी बहुत अच्छी नौकरी भी नहीं थी,ले-देकर अपने पिताजी की जायदाद में से मिले घर में रह रहे थे, वो नितिन को विदेश कैसे भेज पायेंगे?

सावित्री जी अपने पति की बहुत चिंता करती थी, उनके पति चाहें पैसे वाले नहीं थे पर बहुत ही अच्छे मन के थे,




उन्होंने हमेशा उनको सम्मान दिया था और बहुत अच्छे से रखा था। अपने पति द्वारा मिले प्यार और सम्मान से ही उनका चेहरा चमकता था पर आज वो फ्रिक में थी कि आखिर वो कैसे इतने रूपये का इंतजाम करेंगे ?

नितिन की बात भी गलत नहीं थी, उसके पास भी अपने भविष्य बनाने का सुनहरा मौका हाथ लगा था, वो भी जीवन में कुछ बनना चाहता था, तरक्की करना चाहता था, इस उम्र में करियर बन जायेगा तो जीवन भर के लिए आराम हो जाएगा।

नितिन ने विदेश के कॉलेज के लिए फॉर्म भर दिया था, उसे पता था मम्मी तो मना करेगी पर पापा पैसों का इंतजाम जरूर कर लेंगे।

रात को बिस्तर पर वो लगातार करवटें ले रही थी, उनकी आंखों में नींद की जगह चिंता थी, वो पास ही लेटे हुए महेश जी के चेहरे को सवालिया नज़रों से देख रही थी, वो अपनी ही गणित में उलझे हुए थे और कुछ सोच रहे थे।

सावित्री, हम ये घर गिरवी रख दें तो हमें बहुत सा पैसा मिल जायेगा और नितिन की विदेश में पढ़ने की इच्छा भी पूरी हो जायेगी।

ये आप क्या कह रहे हैं!! घर गिरवी…. ये तो बड़ा मुश्किल होगा, अपने घर को गिरवी रखना मतलब अपने सर से छत को खो देंगे, अगर हम कर्ज चुका नहीं पायें तो कहां पर जायेंगे? कौन हमें सहारा देगा ? हम कहां रहेंगे?

अरे!! तुम यूं ही फ्रिक कर रही हो? जब नितिन की पढ़ाई पूरी होगी और उसके बाद वो कमाने लगेगा तो ये घर छुड़ा लेंगा, अगर वो विदेश में ही नौकरी करेगा तो यहां के मुकाबले चौगुना कमायेगा और सारे घर का और बाहर का कर्ज उतार देगा।

पुरखों का बनाया घर गिरवी रख दोगे क्या?

हां, वो तो रखना पड़ेगा, इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है, सब जगहों से पहले ही कर्ज ले रखा है, वो भी तो चुकाना है, उनका भी तो ब्याज जाता है, तू चिंता मत कर बस कुछ सालों की ही बात है, सब कुछ अच्छा होगा, तू ईश्वर पर पूरा भरोसा रख, महेश जी ने पत्नी को दिलासा तो दे दी, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें भी ये बात कचोट रही थी कि वो अपने पुरखों के बनायें घर को गिरवी रखने जा रहे हैं, एक टीस सी मन में उठ रही थी, आंखों में एक दर्द था जिसे सिर्फ  सावित्री जी ही समझ पा रही थी।

अगले दिन ही उन्होंने दो -चार जान पहचान वालों को बोल दिया, ये घर बीच चौराहे पर था, यहां से हर तरह के रास्ते होकर जाते थे, कुछ लोग इस घर को लेने पहले भी आये थे पर उन्होंने मना कर दिया था, ऐसी मौके की जमीन पर मॉल बनाकर वो इसका व्यवसायीकरण करना चाहते थे।




आखिरकार भीगी आंखों से सावित्री जी ने बेटे की खुशी के लिए जमीन गिरवी रखने की सहमति दे दी। नितिन के जाने की तैयारी हो गई, टिकट बन गये थे, महेश जी ने बाकी का पैसा उसके खाते में जमा करवा दिया और नितिन अपने सपनों के पंख लगाकर सात समंदर पार चला गया।

एयरपोर्ट से अपने बेटे को दूर जाते देख रही सावित्री जी की आंखें हवाई जहाज का पीछा करती रही, वो तो ओझल हो गया है, अब तुम घर चलो, महेश जी ने झकझोरा, पर वो तो जैसे अतीत की गहराइयों में खो चुकी थी, ईश्वर की कृपा से देर से ही सही उनकी गोद हरी हुई थी, पुत्र रत्न को प्राप्त कर वो अपने भाग्य पर गर्व कर रही थी और ये सपने देखने लगी थी कि कब नितिन बड़ा होगा, नौकरी करेगा और इसकी शादी होगी, घर में बहू आयेगी, अभी तो सभी सपने पंक्ति में खड़े थे क्योंकि नितिन केवल पढ़ने विदेश गया था, अभी तो वो दो साल पढ़ाई करेगा।

नितिन का फोन नहीं आया, अब तो उसकी पढ़ाई पूरी हो गई होगी, आजकल महीनों तक फोन ही नहीं करता है, हम करते हैं तो उठाता भी नहीं है, सावित्री जी ने चिंता जताते हुए कहा, तुम व्यर्थ चिंता करती हो, अभी उसकी परीक्षाएं चल रही है व्यस्त होगा, महेश जी दिलासा देते थे।

कुछ महीनों बाद पता चला कि नितिन की नौकरी लग गई तो दोनों मंदिर ईश्वर का धन्यवाद करके आयें और प्रसाद चढ़ाकर भी आयें, काश!! नितिन हमारे साथ होता!! उसे क्या अपने देश में नौकरी नहीं मिल सकती है??

हां, मिल तो जायेगी, पर वहां ज्यादा आमदनी मिलेगी, तभी तो वो हमारा घर कर्ज से छुड़वा लेगा, महेश जी ने उम्मीद भरी सांस लेते हुए कहा।

नौकरी लगे तो महीनों हो गये, और घर गिरवी रखने वाला भी रोज तकादा करने आ जाता है, अभी तक तो उसने एक भी पैसा नही भेजा है, सावित्री जी ने याद दिलाया पर इस बार महेश जी चुप थे, वो खुद परेशान हो गए थे। कुछ दिनों बाद नितिन का फोन आता है कि उसने यहां एक भारतीय लड़की से शादी कर ली है और नया घर भी ले लिया है, आप फोन पर ही आशीर्वाद दे दें।

शादी….!!! कर ली, हमें शादी होने के बाद बता रहा है, और मेरी आंखें जो उसकी शादी के सपने देखती थी, उसका क्या!! और सावित्री जी की रूलाई फूट पड़ी, महेश जी ने अपना कांधा आगे करके उन्हें सहारा दे दिया, रोते -रोते ही उनकी आंख लग गई।

घर की सारी जमा पूंजी भी खर्च हो रही थी, ऊपर से कर्ज का ब्याज देना भी भारी हो रहा था, लगातार तनाव से दोनों की सेहत गिरने लगी और एक दिन उनका घर भी उन दोनों के हाथ से चला गया। पास ही की बस्ती में वो एक कमरा लेकर रहने लगे।

उस दिन के बाद नितिन का फोन कभी नहीं आया और यहां से महेश जी फोन लगाते थे पर वो नंबर ही व्यस्त  आता था, बेटे से मिलने की आस लिये दोनों पति-पत्नी अब वृद्ध हो चले थे। सालों से उनके बेटे ने उनकी खबर नहीं ली, मंदिरों से मिले प्रसाद पर दोनों जीवन यापन कर रहे थे, कभी तो भरपेट मिल जाता था और कभी आधे भरे पेट से ही सो जाते थे।

चिंता फ्रिक में हाथ पैर भी काम नहीं करते थे, दोनों बस अपने जीवन के दिनों को गिन रहे थे, और अभी भी एक उम्मीद थी कि उनका नितिन उनसे मिलने एक दिन जरूर आयेगा।

महेश जी की हालत बहुत खराब थी, वो अपना कर्ज भी चुका नहीं पा रहे थे और ब्याज देने के लिए भी उनके पास में पैसे नहीं थे, वो अपनी आखिरी सांसें गिन रहे थे तो सावित्री जी ने एक बार फिर से फोन किया, तेरे पापा मर रहे हैं, तुझमें प्राण अटके हुए हैं, तू एक बार तो आजा, उनके अंतिम दर्शन के लिए और फोन रख दिया।




कुछ दिनों बाद नितिन उनके कमरे के बाहर खड़ा था, उसने जैसे ही कमरे में कदम रखा और महेश जी ने प्राण त्याग दिए, सावित्री निशब्द थी, फिर चीखकर बोली, मेरे सुहाग का हत्यारा आ गया!!!

नितिन ने जैसे ही ये शब्द सुने उसके रोंगटे खड़े हो गए, वो अपनी मम्मी से नजरें नहीं मिला पाया, अब तुझे फुर्सत मिली है, सालों से तेरे पापा तुझे याद कर रहे थे, तुझसे मिलने को तरस रहे थे, अरे!! उनके तुझ पर बहुत अहसान है, ये शरीर भी तुझे उनसे मिला है, तेरे पापा ने तेरी हर इच्छा पूरी की, तेरी पढ़ाई के लिए पैसा जुटाने में दिन रात पसीना बहाया। तेरे पापा ने सर्दी, गर्मी, बारिश हर मौसम में काम किया ताकि तेरे स्कूल और कॉलेज की फीस भर सकें। खुद दीपावली पर कभी नये कपड़े नहीं खरीदे पर तुझे हर साल दिलाते थे, खुद फटे जूते पहनते थे पर तुझे नये जूते दिलाते थे, उनके स्वेटर में छेद हो गये थे फिर भी नया स्वेटर नहीं खरीदा पर तुझे नया जैकेट पहनाया, खुद फटी बिवाइयों से साइकिल का पैंडल चलाते थे पर तुझे मोटर साइकिल दिलाई, खुद इस छोटे से कमरे में सालों गुजार दियें पर तेरी पढ़ाई के लिए अपना घर तक गिरवी रख दिया, और वो घर भी अब उनके हाथों से चला गया। तेरे पापा ने जो तेरे लिए किया है तूने उसकी अहमियत कभी नहीं समझी।

अरे!! नालायक मां तो सिर्फ नौ महीने ही कोख में पालती है पर पिता बच्चों के आत्मनिर्भर होने तक सालों साल अपने खुश पसीने की कमाई से उनके खान-पान, शिक्षा,करियर, रहने सहन की जिम्मेदारी उठाता है और अपने बच्चों को पालता है।

कभी तुझे ये ख्याल नहीं आया कि हम तेरे बिन कैसे रह रहें होंगे, तेरी वजह से जो इतना कर्ज लिया था, वो हम चुका पायें या नहीं!! हमने भरपेट खाना भी खाया या नहीं!! तूने कभी नहीं पूछा बस अपनी ही दुनिया में मस्त रहा, तूने तो देश के साथ अपने मम्मी -पापा को भी छोड़ दिया, हमसे सारे रिश्ते खत्म कर लिये।

तेरे पास कमी थी तो पैसे मत भेजता, कम से कम हमसे बात तो करता, तुझे ये तो पता चलता कि तेरे मम्मी -पापा जिंदा है या मर गये है, कभी तो उनकी सुध लेता!! कभी तो !!! और सावित्री जी दहाड़ मारकर रोने लगी, आज पति का कांधा उनसे छीन चुका था और बेटा भी शर्म से गर्दन झुकाए खड़ा था।

पिता का प्यार और दुलार सौभाग्य से मिलता है, पिता को प्रेम कभी नजर नहीं आता है, पिता के प्रेम को आंका नहीं जा सकता है, दुनिया में कितने ही लोग हैं जिन्हें पिता का नाम और पिता की छांव नहीं मिलती है, तूने अपने सौभाग्य पर खुद ही ठोकर लगा दी, तूने अपने जन्मदाता अपने पालनकर्ता का दिल दुखाया है, मैं तुझे कभी माफ नहीं करूंगी।




मम्मी, मुझे माफ़ कर दो, मैं पापा के सारे कर्ज चुका दूंगा, नितिन ने रोते हुए हाथ जोड़कर कहा।

अब तो तू कुछ भी कर लें, क्या फायदा!! वो तो एक उम्मीद लिये हुए इस दुनिया से चले गए, तू पापा का लिया हुआ कर्ज चुका देंगा, पर तेरे पापा का जो कर्ज तेरे ऊपर है तू उसे कभी चुका नहीं पायेगा,उनकी आत्मा तो अतृप्त ही रहेगी।

महेश जी की अर्थी सज जाती है, उन्हें मुखाग्नि दे दी जाती है, सावित्री जी निढ़ाल सी हो जाती है और चुपचाप कुर्सी पर बैठ जाती है, उन्हें लगा जैसे उनके प्राण निकल गए थे, कुछ देर बाद नितिन उन्हें हिलाता है पर वो निष्प्राण होकर झूल जाती है, आज उसने पापा के साथ अपनी मम्मी को भी हमेशा के लिए खो दिया था, जैसे दोनों बरसों से उसकी ही राह देख रहे थे….. दोनों के प्राण अपने बेटे से मिलने और उसे देखने के लिए ही रूके हुए थे……नितिन स्तब्ध रह जाता है।

पाठकों,  बच्चों को पालने और उनकी शिक्षा, भविष्य बनाने हेतु, माता-पिता अपने खून पसीने की कमाई लगा देते हैं। पिता अपने बच्चे की परवाह करता है उसके लिए दिन रात मेहनत करता है, ये भी तो प्रेम ही है।

देते हैं, और जिन माता -पिता का सहारा लेकर बच्चे आगे बढ़ते हैं, एक दिन उनकी ही उपेक्षा करके उन्हें भुला देते हैं। बच्चो का अपने माता-पिता के प्रति फर्ज कभी नहीं भुलना चाहिए।

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#प्रेम 

धन्यवाद

लेखिका

अर्चना खंडेलवाल

 

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