पहली रसोई! – प्रियंका सक्सेना : motivational story in hindi

वात्सल्य और सुनंदा की शादी धूमधाम से सम्पन्न हो गई। सारे रस्मों- रिवाज़ के साथ सुनंदा ने घर में प्रवेश किया। कुछ दिनों तक सगे रिश्तेदार बुआ, मौसी, चाची और मामा लोग घर में रुके हुए हैं। बहू के हाथो बनी पहली रसोई का सबको बेसब्री से इंतज़ार है।

पहली रसोई में सभी ने सुनंदा की पहली रसोई के स्वादिष्ट पकवानों का जी भर कर आनंद उठाया और खुशी-खुशी आशीर्वाद और नेग से सुनंदा की झोली भर दी।

ये राज की बात है कि सुनंदा ने सिर्फ खीर में ड्राई फ्रूट्स डाले थे और कुछ ऊपरी काम किया था।

चलिए पता करते हैं कि पहली रसोई कैसी रही सुनंदा की…

दरअसल सुनंदा की सासु मां सुधा जी को पता था कि सुनंदा बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी रही तो उसे बस काम-चलाऊ खाना जैसे दाल- चावल, रोटी ही बनाना आता हैं साथ में जीरा आलू भी बना लेती है।

सुनंदा की माॅ॑ मालती जी ने बड़े सकुचाते हुए सुधा जी को यह बात बताई थी जिस पर सुधा जी ने हंसकर कहा था कि बहू ले जा रहे हैं महाराज़िन ( खाना बनाने वाली)  नहीं! आप चिंता ना करें , निश्चिंत रहिए।

विवाह के पश्चात चार दिन बाद ही बात जब बहू के हाथों बनी पहली रसोई की आई तो सुनंदा के हाथ- पांव फूल गए।‌ सुनंदा को लगने लगा कि मम्मी जी ने उसकी माॅ॑ से ऐसे ही कह दिया था , इतने लोगों का खाना कैसे बना पाएगी वो! अब तो भगवान ही बचाएं मुझे…

वास्तव में सुनंदा ने खीर और हलवा बनाना इतने दिनों में सीख लिया था और कुछेक सब्जियां, जैसे पनीर की डिशेज, मटर आलू भी सीख ली थीं परंतु करीबन चार-छह लोगों के हिसाब से सीखा था ।

अभी तो घर में करीब बीस लोगों के हिसाब से  खाना बनाना है, कल मेरा क्या होगा? सोच-सोचकर सुनंदा की फूंक सरके जा रही थी।



रात को सोने से पहले जब वह सासु माॅ॑ से मिलने गई तब उन्होंने उससे कहा,”बहू सुबह आराम से उठना कोई जल्दबाजी ना करना।”

“मम्मी जी, मैं जल्दी उठ जाऊंगी, कल पहली रसोई है और मुझे घबराहट हो रही है।”

सुधा जी ने वात्सल्य से कहा,” सुनंदा को जल्दी उठने की जरूरत नहीं है।”

सुनंदा ने सुबह पांच बजे का अलार्म लगाया जिसे वात्सल्य ने चुपके से सात बजे का कर दिया।

सुबह अलार्म की कर्कश आवाज सुन सुनंदा की ऑ॑ख ज्यों खुली उसे समय ‘सात बजा’ देखकर करंट लग गया।

वात्सल्य बोला,’ मैंने अलार्म आगे बढ़ाया था.. यार, तुम फालतू चिंता कर रही हों, मम्मी सब देख लेंगी।”

खैर जल्दी से नहा धोकर साड़ी पहनकर सुनंदा नीचे पहुंची तो सबसे पहले मम्मी जी से ही मुलाकात हुई। देखते ही बोली,” बेटा, तुम्हें रसोई में साड़ी में असुविधा होगी जाओ सूट पहनकर आओ।”

सुनंदा वैसे ही साड़ी में अनकम्फर्टेबल महसूस कर रही थी फटाफट भागकर सूट पहनकर रसोई में पहुंची तो क्या देखती है कि मामी जी और चाची जी दो बर्नर पर सब्जी चढ़ा चुकी हैं, कढ़ाही पनीर और मिक्स वेजिटेबल की…मौसी जी पूरी का आटा गूंध रही हैं।  तभी बुआ तीसरे बर्नर पर कुकर में उबाल कर रखे हुए छोले छौंकने लगी। मम्मी जी की पीठ थी उसकी तरफ, वह डिब्बे में से कुछ निकाल रही थीं।

यह सब देखकर सुनंदा रसोई के दरवाजे पर खड़ी की खड़ी रह गई।

मम्मी जी ने देखा तो उसे पास बुलाया,” सुनंदा, अब पांच-सात मिनट में सभी बर्नर खाली हो जाएंगे। तब तक बेटा तुम चाय- नाश्ता कर लो, मान्या अपनी भाभी को नाश्ता करा दो।”

मान्या ने उसका और सुनंदा दोनों का चाय-नाश्ता डाइनिंग टेबल पर रखा, सुनंदा ने पूछा,” मम्मी जी , चाची जी और सब लोग?”

“भाभी सबका नाश्ता हो गया है। मैं आपके लिए रुकी हूॅ॑ ना!” बातें करते नाश्ता कर झटपट सुनंदा रसोई में आ गई।

रसोई में अब केवल मम्मी जी ही थीं, बाकी सभी लोग तैयार होने चले गए हैं।

मम्मी जी ने उसे कहा,” सुनंदा तुम ड्राई फ्रूट्स कतर लो।”

सुनंदा ने ड्राई फ्रूट्स कतरे तब तक सभी सब्जियां पक चुकी थीं और सुनंदा से एक बड़े पतीले में भीगे चावल डलवाकर मम्मी जी बोली,” बेटा सलाद काट लो।”



सुनंदा ने सलाद काटकर उसे प्लेट में सजा दिया,तब तक खीर चलाती रही मम्मी जी। अब चीनी , इलायची पाउडर और ड्राई फ्रूट्स सुनंदा से ‌खीर में डलवाकर मम्मी जी बोली,” बेटा जरा दही फेंट लो।”

फिटे दही में भीगी बूंदी सुनंदा से डलवाकर रायता बनवा लिया।

इतने में मामी जी, चाची जी सभी लोग तैयार हो कर आ गए।

“चलो बेटा अब सभी आने वाले हैं तो बर्तन-प्लेट सेट कर‌ लेते हैं।” मामी जी ने कहा

उधर रसोई में सुनंदा ने मम्मी जी, बुआजी, मामीजी, चाची जी, मौसी जी सभी को दिल से धन्यवाद व्यक्त किया और कहा,” मैं बहुत खुशनसीब हूॅ॑ कि मुझे इतना प्यार देने वाला ससुराल मिला। मैं सच में आज की पहली रसोई को लेकर बड़ी डरी हुई थी और आप लोगों ने तो मेरे बिना कहे सब समझ लिया और सभी काम कर दिया, मैं हृदय तल से आपकी आभारी हूॅ॑।”

सभी एक साथ बोले,” बेटा हम सभी तुम्हारे अपने हैं। चलो खाना लगाते हैं।”

डाइनिंग हाॅल‌ में डाइनिंग टेबल को कार्नर पर करके नीचे फर्शी दरी बिछाकर खाने का इंतजाम किया गया जिसमें वात्सल्य और ननद मान्या ने मदद की।

पहली पूरी सुनंदा से उतरवा कर मम्मी जी ने उसके हाथ से बेलन ले लिया।अब मम्मी जी पूरी बेल रही हैं और मामीजी  पूरी सेंक रही हैं एवम् सुनंदा सर्व कर रही है….पापाजी, मामाजी, चाचाजी, मौसाजी, फूफाजी सभी ने खूब तारीफें कर करके खाना खाया। पहली रसोई के भर भरकर नेग दिए सभी ने…..

मम्मी जी ने वात्सल्य, मान्या, चाचीजी, बुआजी और मौसी जी और सभी बच्चों को भी साथ ही खाने के लिए बिठा दिया। …इसके बाद मम्मी जी और मामी जी का खाना लगाकर सुनंदा पूरी सेंकने खड़ी हो गई तभी चाची जी ने हाथ से बेलन लेते हुए कहा,” बेटा, साथ में खाना खाओ।”

मेधा ने देखा था कि मम्मी जी ने चाचीजी के कान में कुछ कहा था।

 मान्या ने सुनंदा को खाने पर बिठाया,” भाभी, अब हम सर्व करेंगे।”

सुनंदा की खाना खाते हुए ऑ॑खें भर आईं तो वात्सल्य छेड़ने लगे, “मम्मी लगता है तुम्हारी बावर्ची बहू को खाना अच्छा नहीं लगा, देखो ना रो रही है।”

चेहरे पर मुस्कान व भीगी ऑ॑खों साथ सुनंदा बोली,” ये खुशी के आंसू हैं मेरे परिवार को किसी की नजर ना लगे।”

भावविभोर हो कर मम्मी जी ने अपनी प्यारी सी बहू की फौरन ही नजर उतार दी… सास और बहू में प्यार का विश्वास के अनूठे बंधन में बंध चुकी थीं। ससुराल के सभी रिश्तों से गहरा  जुड़ाव महसूस कर रही थी सुनंदा…

दोस्तों, कैसी लगी आपको सुनंदा की पहली रसोई? आशा है सुनंदा का ससुराल आपको भी भा गया होगा। ज़िन्दगी का एक खूबसूरत पड़ाव या कह लीजिए एक मोड़ होता है, ‘विवाह’ और यदि इतना समझदार ससुराल मिले तो ज़िन्दगी की बगिया में रंग ही रंग बिखर जाते हैं और फिर प्रेम का, आपसी समझ का और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का ऐसा बंधन जुड़ता चला जाता है जो टूटता नहीं!

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धन्यवाद।

-प्रियंका सक्सेना

(मौलिक व स्वरचित)

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