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मुक्ति और मोक्ष  – कमलेश राणा

अरे यह क्या… मैं तो यहीं हूँ फिर ये सारे प्रियजन इस तरह से मेरा नाम लेकर विलाप क्यों कर रहे हैं। ओह!! मैं तो जाग रहा हूँ फिर आँखें क्यों बंद हैं मेरी और कोई हरकत क्यों नहीं हो रही मेरे शरीर में… आभा यह सुहाग चिन्ह क्यों हटा रही हो तुम.. नहीं.. नहीं.. ऐसा मत करो इन्हें पहन कर ही तो तुम्हारा सौंदर्य निखरता है। अरे ताई जी आभा का सिंदूर क्यों पोंछ दिया आपने.. और यह आभा कुछ बोलती क्यों नहीं.. विरोध क्यों नहीं कर रही सबको मनमानी करने दे रही है अब मुझे ही कुछ करना होगा। हाथ से ताई जी को हटाने का प्रयास करता है पर यह क्या.. उनपर कोई असर ही नहीं होता। वह आभा को संभालने की कोशिश करता है परंतु वह भी उसकी ओर देखकर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही है बस उसके पास बैठी रोये जा रही है।

तभी दो देवपुरुष उसके पास आकर कहते हैं …चलो इस संसार में तुम्हारा समय अब पूरा हुआ । हम तुम्हें लेने आये हैं यमराज की सेवा में उपस्थित होना होगा तुम्हें। वह तुम्हारे कार्यों के अनुरूप तुम्हारे पाप पुण्य का हिसाब करेंगे और फिर उसके अनुसार सज़ा या पुरस्कार निश्चित करेंगे। पर क्यों.. मेरे बिना मेरा परिवार कैसे जीवित रहेगा देखो न मेरी पत्नी, बच्चे और करीबी किस तरह बिलख रहे हैं मेरे लिए.. क्या तुम्हारे दिल में लेशमात्र भी दयाभाव नहीं है। मुझे नहीं जाना कहीं.. न ही पुरस्कार की कोई लालसा है यहीं रहने दो न मुझे.. मैं इस मायाजाल में ही खुश हूँ नहीं चाहिए मुझे मुक्ति और मोक्ष। पुत्र जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है यही संसार का नियम है हम तुम्हारे मुँह से तुम्हारी जीवन गाथा सुनना चाहते हैं। मैंने कहना शुरु किया..

शुरु से ही मेरा रुझान ईश्वर भक्ति की ओर रहा। पूजा पाठ में मेरा मन अन्य कार्यों से अधिक लगता यह देखकर माँ को चिंता होने लगी कि कहीं मैं वैरागी न हो जाऊँ । वह बार बार मेरा ध्यान वहाँ से हटाकर भविष्य के सुनहरे सपने दिखातीं। पिता हमेशा पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते। वह समझाते कि जब संसार में जन्म लिया है तो सबके प्रति कर्तव्य निभाना ही सबसे बड़ी पूजा है। ईश्वर ने इस संसार में तुम्हें कुछ जिम्मेदारियां निभाने के लिए भेजा है। दूसरों के दुःख को दूर करना सबसे बड़ी इबादत है क्योंकि आत्मा में ही परमात्मा का वास होता है और इस सीख को ही मैंने अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया। हाईस्कूल तक आते – आते मुझे समझ में आ गया था कि किसी की मदद करने के लिए मन के साथ- साथ धन का होना भी आवश्यक होता है




और मैंने अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित कर दिया। बचपन में जब भी मैं माँ से भगवान के बारे में पूछता तो वह आसमान की ओर इशारा करके बतातीं कि वह वहाँ रहते हैं और तब से ही मैं आसमान में बादलों की बनती बिगड़ती आकृतियों में उन्हें ढूँढने का प्रयास करता और इस तरह एक अजीब सा रिश्ता बन गया था उसके और मेरे बीच अतः मैंने पायलट बनने की तैयारी शुरू कर दी। मेरी मेहनत रंग लाई और वह शुभ घड़ी आ गई जब मुझे पहली उडान भरने का सौभाग्य मिला अब मैं सिर्फ अपने देश में ही नहीं विदेशों में भी जाता और जो कोई भी जरूरतमंद दिखाई देता उसकी हरसंभव मदद करता। आभा मेरी बैचमेट थी हम दोनों ही एक दूसरे को पसंद करते थे। सबकी रजामंदी से हमारी शादी हो गई और एक प्यारे से बेटे शिवा ने हमारी फुलवारी को महका दिया।

एक दिन घना कोहरा छाया हुआ था मेरा प्लेन हिमालय के ऊपर उड़ रहा था मौसम की खराबी के कारण अचानक ही हमारा संपर्क कंट्रोल रूम से कट गया और प्लेन एक चोटी से टकरा कर लहराता हुआ बर्फ़ीली वादियों में समा गया । बड़ी मुश्किल से सारे शवों को उनके घर पहुंचाया जा सका था। यमराज ने कहा.. पुत्र तुमने अपने जीवन में बहुत पुण्य कमाया है मैं तुम्हें स्वर्ग भेजता हूँ। मैंने गिड़गिडाते हुए कहा पर मैं वहाँ खुश नहीं रह पाऊंगा क्योंकि मुझे तो खुशी बस दीन दुखियों की सेवा में ही मिलती है। तभी आकाशवाणी हुई.. तुम धरती पर सशरीर वापस नहीं जा सकते पर तुम्हारे विचारों ने हमें अपने नियम बदलने पर मजबूर कर दिया है। हम तुम्हें तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए और वक्त देते हैं अब तुम अदृश्य रहकर लोगों की मदद कर सकते हो। जाओ पुत्र तुम जैसे धर्मात्माओं की हर जगह जरूरत है यही सबसे बड़ी मुक्ति भी है और मोक्ष भी। तब से मैं रास्ता भटके हुए हवाई जहाजों को रास्ता दिखाता हूँ और उन पर्वतारोहियों की भी मदद करता हूँ जो बर्फीले तूफान में फंस जाते हैं और यह मुझे बहुत खुशी देता है।

#वक्त

स्वरचित एवं मौलिक

कमलेश

राणा ग्वालियर

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