मंज़िल – सुनीता मिश्रा

मै नहीं जानती थी की मैं कहाँ जा रही हूँ । रात का समय, बारिश की झड़ी लगी थी। बिजली और बादलों की गड़गड़ाहट में होड़ लगी थी। मैं पूरी तरह भीग गई थी। तरबतर थे कपड़े। होश नहीं था मुझे। आखिर मेंरा कसूर क्या था। इतना ही न मैंने आज उस पर हाथ उठा दिया जो रोज मुझे बातों से, लातों से मारता था। वो जो मेरा मरद था।मुझे बाहर धक्का दे,कोठरी अंदर से बंद  कर ली। अंदर वो और उसकी चम्पा थी। कितनी गुहार लगाई मैंंने इतनी रात में मैं कहाँ जाऊँगी, अनाथ हूँ मैं। पर उसने नहीं सुनी।

घर मेरी कमाई पर चलता था। उसकी शराब, रोटी और उसकी चहेती चम्पा के नखरे पूरे होते थे।

माँ बाप नहीं थे मेरे। बस्ती की बुआ ने पाला। जैसे जैसे बड़ी हुई, बुआ के घर सारा काम करती। बुआ जब रात को सोती उसके पैर दबाती। फिर फूफा के बिस्तर पर जाती। वो कलूटा, थुलथुल सा, पकी उमर का, मुझे बिल्कुल न भाता पर वो बुआ के सोने के बाद मुझे मिठाई खिलाता, जो मेरे लिये लाता था। कभी कभी गिलट के बुंदे, पायल भी लाता। मैं बुआ से झूठ बोलती की बगल की झुग्गी की काकी लाई मेरे लिये। काकी को मेरी और फूफा की कहानी पता थी। काकी मेरे फूफा को ऊँगलियाँ चटका कर गाली भी देती”हरामी के कीड़े पड़ेंगे शरीर पर, बेटी बरोबर लड़की से—–“

एक दिन फूफा ने इस आदमी को मेरा हाथ पकड़ा दिया। सुना फूफा ने इससे कर्जा लिया था। मुझे देकर चुकाया गया। मैं खुश थी फूफा से पिंड छूटा। अब गबरू जवान मरद था मेरा। काकी ने मुझे साड़ी और चूड़ियाँ दी लाल और हरी रंग की। काकी ने बताया ये चूड़ियाँ गोविंद लाया तेरे को देने के लिये।

गोविंद काकी का बेटा, शहर में किसी फेक्ट्री में मजूर था। सपने बड़े बड़े देखता था। काकी कहती “पागल है मेरा बेटा, अपने बाप पे गया है। कितना कहती हूँ जमीन पर रह गोविंद। अपने बाबा की तरह न बन। बहुत दुख पायेगा रे। “गोविंद का बाबा जेल में है। सुना लम्बी सजा मिली हत्या के जुर्म में।




काकी बताती गोविंद के बाबा ने हत्या नहीं की। किसी ने उसे फँसाया है उसे। और देखना सच जरुर सामने आयेगा। सच तो सामने नहीं आया, हाँ गोविंद के बाबा ने जेल में अपनी हाथ की नस काट लीऔर अपना इन्साफ कर लिया।

मेरे को गोविंद अच्छा लगता था। पर गोविंद के मन का मेरे को नहीं पता था।

अपने गबरू मरद के साथ जिन्दगी कुछ दिनों अच्छी चली। फिर उसको चम्पा अच्छी लगने लगी। वो सब चम्पा पर लुटाने लगा। नशा और चम्पा का जोर उस  पर छाने लगा , उसने अपना काम धन्धा छोड़ दिया। पैसों की तंगी होने लगी।

उसने नया तरीका निकला, रोज मेरे लिये, अपनी औरत के लिये नया ग्राहक लाने लगा। पहिले तो मैंने इन्कार किया, उसको गलियाँ दी, रोई,फिर चुपचाप झुक गई, पेट की आग बुझाने के लिए।

वो और चम्पा बाहर जाते मैं और ग्राहक कोठरी के भीतर।

कई दिनों से मुझे ताप हो रहा था। शरीर टूटता लगता, बस लगता चुपचाप पड़े रहो। आज बहुत बारिश हो रही थी। मेंरा शरीर तप रहा था। कमजोरी हो रही थी। मैंने ग्राहकी से मना कर दिया कहा”मैं ये सब अब नहीं करुँगी, मेरे पैसे पर तुम दोनो मज़े करते हो। अब तू चम्पा के लिये ये काम कर।”

मेरे इतना कहते ही लात घूँसो की दोनों ने मिल कर बरसात शुरु कर दी मुझ पर। और धक्का दे कोठरी के बाहर निकाल दिया।

मैंने होश में आते ही देखा जिस झुग्गी में मैं हूँ वो जानी पहिचानी सी लगी। उठ कर बैठ गई, सामने गोविंद गरम दूध का गिलास लिये खड़ा था। उसने मेरे मन के उठते प्रश्नो को जान लिया था शायद।बोला-“तू मेरी झुग्गी में है। तेरे बुआ फूफा अब यहाँ नहीं रहते। मैं फेक्ट्री से लौट रहा था, बारिश के कारण देर से निकला। रास्ते में एक पेड़ के नीचे कोई पड़ा हुआ दिखा, पास जाकर देखा तो तू थी। मैं तुझे अपने घर ले आया। माँ, मामा के घर गई है, कल शाम लौट आयेगी। अब तू कहीं नहीं जायेगी। इस घर में हमारे साथ रहेगी। “एक सांस में गोविंद ने कह दिया।

मेरे होठों पर हल्की मुस्कराहट आ गई। निकली तो अनजान सफर पर थी, पर मंज़िल पर पहुंच गई।

#सहारा 

सुनीता मिश्रा

भोपाल

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