मै बच्चों को माफ नहीं कर सकती (भाग 2) – अर्चना खंडेलवाल : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : रोते-रोते उनकी आंख लग गई, तभी सबसे छोटी बहू
दीपा आती है, ये लो ये तो सोई पड़ी है, अब रसोई कौन बनायेगा? सबको भूख लग रही है, इन्हें तो कोई काम है नहीं पर हमें तो अपने बच्चों को भी संभालना पड़ता है।
इन पर तो कोई जिम्मेदारी नहीं है, ललिता जी की नींद खुली और वो उठकर रसोई में चली गई।
तीनों बेटे उनके पति की दुकान संभालते है और तीनो बहूंएं घर पर बच्चों को देखती है, और उन्हें इस उम्र में भी रसोई देखनी होती है, इतने लोगों का खाना बनाना होता है।
तभी बड़ी बहू रसोई में आती है, जरा जल्दी- जल्दी हाथ चलाइये, सुबह का सारा समय तो आपने नौटंकी करने में गंवा दिया अब सबके खाने का समय हो गया है, थोड़ी देर बाद ये लोग भी दुकान से आते ही होंगे।
ललिता जी ने खाना बना दिया, सब लोग आकर खाना खाकर चले गये, उन्हें भी भूख लग रही थी पर उन्हें सबसे आखरी में खाना मिलता था, वो भी पूरा मिल जाये तो गनीमत है।

दोपहर को वो पड़ोस के घर में भजन के लिए जा रही थी पर उनके पास कोई अच्छी साड़ी नहीं थी, उन्होंने अपनी बहू से कहा कि कोई अच्छी साड़ी हो तो निकाल दें, दस लोगों के बीच में जाना है, घर की नाक कट जायेगी, लोग बातें बनायेंगे।

अरे!! तो मत जाओं, कौन कहता है इधर-उधर जाओं, वैसे भी अभी बहुत सारी सब्जियां साफ करनी है वो कौन करेगा? मुझे तो बच्चों को स्कूल से लाना है और पढ़ाना भी है। साड़ी मेरे पास कोई नहीं है, अपने बेटों से मांगो, मै थोड़ी ना कमाने जाती हूं।
ललिता जी मन मसोसकर रह गई, उनकी जिंदगी नरक से कम नहीं थी, सुबह से लेकर रात तक बेटे -बहू की सुनो, फिर दिन भर घर के काम में लगे रहो।
उनकी स्थिति नौकरानी से भी बदतर बना रखी थी,वो तो सोचा करती थी, तीन बेटे हैं बुढापा आसानी से कटेगा।

लेकिन वो गलत थी, उन्होंने ही अपने तीनों बेटों को बड़े लाड़-प्यार से पाला था, उनकी गलती पर भी उन्हें कभी नहीं डांटा, जिससे वो बदतमीज हो गए थे, उनकी हर इच्छा पूरी की, उन्हें उनके मन की करने दी जिस कारण वो आज अपनी विधवा मां की जरा भी कदर नहीं करते थे।
ललिता जी जब तक सुहागन थी, उनकी घर में बड़ी चलती थी, पति रूपचंद की बड़ी सी कपड़ों की दुकान थी, उसमें तरह-तरह की साड़ियां मिलती थी, दुकान का काम काफी बढ़ चुका था, इसलिए बेटे पढ़ाई पूरी करके घर की दुकान में ही एक-एक करके जुड़ते रहें। उनकी तीन मंजिला दुकान का बहुत नाम था, और वहां पर मिलने वाली साड़ियां भी हर जगह जाती थी, ये बात अलग है कि जिसके पति ने वो दुकान खोली थी, उन्हीं की पत्नी को आज एक साड़ी के लिए तरसना पड़ रहा था। पति रूपचंद की मौत के बाद तीनों बेटे उसी में जम गये थे और अपनी पत्नियों के बहकावे में आकर मां के साथ दुर्व्यवहार करने लगे थे।

एक दिन घर की घंटी बजी, रिश्तेदारों के यहां से शादी का कॉर्ड आया था, सुनो जी चाचा जी के बेटे की शादी है, मै तो जरुर जाऊंगी, और हां मै भी चलूंगी, सबने आपसी सहमति की तो सब जाने को राजी हो गये, पर हम सब चले जायेंगे तो पीछे दुकान कौन संभालेगा?
दुकान पर रघु को रख देंगे, वैसे भी रघु हमारा नौकर सब संभाल लेंगा और घर पर आपकी मम्मी रह लेंगी, अब ये तो विधवा है, भला शुभ काम में जाकर क्या करेगी?
सभी इंतजाम करके तीनो बेटे बहू बच्चों समेत इस पारिवारिक शादी में चले गए। ललिता जी का भी बड़ा मन था, आखिर वो भी जाती तो अपने ससुराल वालों से मिल लेती, शादी के बहाने ही एक दूसरे से मिलना हो जाता है। तीनो बेटे बहू के जाने के बाद अचानक से एक दिन ललिता जी का भाई घर पर आया, तो उन्होंने अपनी आप बीती सुनाई।

ललिता जीजी मुझसे आपकी हालत देखी नहीं जा रही है, कैसे बेटे हैं? मां का एक चश्मा नहीं बनवा सकते? घर की साड़ियों की दुकान है और मां को एक साड़ी लाकर नहीं दे सकते? आपने मुझे बताया क्यों नहीं? जीजाजी के जाने के बाद ये कुछ ही महीनों में आपका क्या हाल हो गया है?
वैसे दुकान तो जीजाजी के नाम पर थी तो उनके जाने के बाद ये दुकान आपकी होगी तो आपने बेटों को उनकी मनमर्जी क्यों करने दी ?
भैया, मुझे तो इतनी जानकारी भी नहीं है और ना ही मैंने इतना सोचा है, मुझे कुछ पता भी नहीं है, घर के कागजात और दुकान के काग़जात तो घर पर ही रखे हैं, पर मैंने तो कभी खोलकर देखे ही नहीं, मन में यही बैठा था कि इनके जाने के बाद ये घर और दुकान तो बेटों की हो जायेगी क्योंकि बेटे ही तो वारिस होते हैं, मै तो अपने आपको भुल ही गई थी।
जीजी, आप मुझे घर के और दुकान के काग़जात दिखा सकती है? ललिता जी ने अपने पुराने बक्से से कुछ फाइलें निकाल कर भाई को दिखा दी, जो उन्होंने कभी खोलकर देखना जरूरी नहीं समझा।
मेरी भोली जीजी महीनों से बेटे-बहुओं के तानें सुन रही हो, खुद की हालत कितनी बुरी बना रखी है, इन कागजों में साफ लिखा है कि जीजाजी के जाने के बाद ये घर और बड़ी सी दुकान आपके नाम पर है, आप चाहों तो अपने बेट -बहूओं को घर से भी निकाल सकती हो और दुकान की सारी कमाई भी आपके हिस्से में ही आयेगी।
आपके जीते जी इन दोनों पर आपके बेटे हक नहीं जता
सकते हैं।
ये सुनते ही ललिता जी का चेहरा खिल गया, उनमें नई जान आ गई, उनके भाई नै उन्हें कुछ बातें समझाई और वो चले गए। ललिता जी अब अपने बच्चों के आने का इंतजार करने लगी।
दो दिन बाद सब परिवार समेत शादी से लौटकर आयें तो आते ही उनके होश उड़ गए क्योंकि उनके कमरों पर ताले लगे हुए थे, आखिर ये ताले किसने और क्यों लगाएं? सबके मन में यही सवाल था।

तभी ललिता जी अपने कमरे से बाहर आई और बोली, तुम सब शादी से आ गये? शादी कैसी रही ?
वो तो सब ठीक रही, पहले ये बताओ, हमारे कमरों में ताले किसने लगाएं है? किसकी हिम्मत हुई ऐसा करने की ?
तुम तीनों के कमरों में मैंने ताले लगाएं है, क्योंकि अब तुम तीनो मेरे घर में नहीं रह सकते हो, अपनी पत्नियों और बच्चों को लेकर यहां से दफा हो जाओं, कहीं और घर ढूंढ लो।
मां, बुढ़ापे में सठिया गई हो? ये क्या मजाक लगा रखा है, हमारा घर है और हमारे ही कमरों में ताला लगा रखा है, आपका दिमाग तो नहीं फिर गया है? राघव चिल्लाने लगा, तभी राकेश भी बोला, मां को पागलखाने भर्ती करवाना पड़ेगा, बहकी-बहकी बातें करने लगी है।
छोटा वाला महेश भी बोला, मां सुबह-सुबह फिर से तमाशा शुरू कर दिया, कमरों की चाबी दे दो, वरना मै पुलिस को बुलाकर ले आऊंगा।
तभी ललिता जी चिल्लाकर बोली, तुम तीनों चुप करो, जरा भी मां से बात करने की तमीज नहीं है, ना तो मै सठिया गई हूं, ना ही मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ा है और ना ही मै कोई तमाशा खड़ा कर रही हूं, ये घर मेरे नाम पर है और मेरी मर्जी है मै तुम्हे इस घर में रखना नहीं चाहती हूं।
तुम तीनों के पिताजी के जाने के बाद ये घर और इस दुकान की मालकिन मैं हूं और अब मेरी मर्जी चलेगी, तुम लोग अपने रहने का और कहीं पर इंतजाम कर लो, और दुकान पर मैंने नये बंदे रख लिये है, मुझे तुम्हारी अपनी दुकान पर भी कोई जरूरत नहीं है। ये दुकान मेरे पति की थी और वो मेरे नाम पर करके गये है।
मां के मुंह से ये बात सुनकर तीनों बेटे और बहूओं के पांवो के नीचे से जमीन ही निकल गई, उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ, आखिर मां भी उनके साथ ऐसा कर सकती है, अब उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था।

अब एक -एक करके सबकी आवाज बदल गई, राघव नरमाई से बोला, मां आप ऐसा कैसे कर सकती हो? अपने ही बच्चों को कोई घर से निकालता है क्या?
पूत कपूत हो सकते हैं पर माता तो कभी कुमाता नहीं हो सकती है।
हां भैया आप सही कह रहे हो, मां आपको हमारी किसी बात से दुख पहुंचा हो तो माफ कर दें, इतनी बड़ी सजा मत दें, अपने बच्चों को लेकर कहां जायेंगे? राकेश बोला।
मां तो बच्चों को माफ कर ही देती है, मां अब हमें साड़ियों का ही काम आता है, दूसरा धंधा कैसे करेंगे? हमारे बच्चे क्या खायेंगे? हम तो एक ही रात में सड़क पर आ जायेंगे, महेश बोला।
तीनो बहूओं की भी अक्ल ठिकाने आ गई, रजनी, रोहिणी और दीपा भी उनके पैरों में गिरकर उनसे माफी मांगती है।

ललिता जी कहती हैं, तुम लोगों ने मेरा बहुत दिल दुखाया है,मै तुम सबको ऐसे तो माफ नहीं कर सकती हूं, सजा दूंगी तभी तो तुम तीनों को सबक भी याद रहेगा, एक मां का ये भी फर्ज है कि वो अपने भूले भटके बच्चों को सही रास्ते पर लेकर आये, बच्चे जब गलती करते हैं तो मां को सजा देने का हक है ताकि उससे बच्चों को सबक मिल सकें। तुम लोगों ने मेरे साथ जो दुर्व्यवहार किया तुम्हारे बच्चो ने भी तुम्हें ऐसा करते हुए देखा है, हो सकता है भविष्य में वो तुम सबके साथ भी वहीं दुर्व्यवहार करें, इसलिए तुम सबको सही रास्ते पर लाना जरूरी है। पैसों की कीमत भी समझाना जरूरी है, तुम सबको पिता का जमा-जमाया धंधा मिल गया तो तुमने कभी संघर्ष नहीं किया।
अब कमरे पर लगे ताले एक साल बाद ही खुलेंगे, तुम सब किराये के घर में रहोगे और काम करने दुकान पर आते रहोगे, लेकिन उसमें से कुछ हिस्सा तुम्हें सैलेरी के रूप में मिलेगा और उसी में तुम्हें घर चलाना होगा।
तीनों बच्चों को सजा देकर ललिता जी का अशांत मन शांत हुआ और वो आत्मसम्मान के साथ रहने लगी।

पाठकों, माता–पिता के साथ किये गये दुर्व्यवहार को तो भगवान भी माफ नहीं करता है, जिस मां ने पाला जन्म दिया, उनका सदैव सम्मान करना चाहिए, आज के व्यस्त दौर में उनके लिए समय नहीं निकाल सको तो कम से कम उन्हें कड़वे बोल बोलकर उनका दिल तो मत दुखाओं।

धन्यवाद
लेखिका
अर्चना खंडेलवाल

 

2 thoughts on “मै बच्चों को माफ नहीं कर सकती (भाग 2) – अर्चना खंडेलवाल : Moral stories in hindi”

  1. अर्चना जी, आपकी कहानियों में विलेन ही क्यों भरे रहते हैं। मैं 80 साल का हूं पर मैंने अपने जीवन में ऐसे विलेन नहीं देखे।

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