कम्मो – अभिलाषा कक्कड़

माँ हम कहाँ जा रहे हैं ?? माँ को कपड़े बेग में डालते देख नन्ही तीन बरस की कम्मो पुछने लगी ।ममता ने प्यार से बेटी की तरफ़ देखते हुए कहा.. तुम्हारी नानी बहुत बीमार है हम उन्हीं को देखने जा रहे हैं । अभी कुछ ही देर में तुम्हारे पापा आ जायेंगे तो हम निकल पड़ेंगे । कैलाश के घर आते ही कममो पापा पापा आ गये कहकर दौड़ी । ममता और कैलाश ने अपने ही नाम से निकाल कर अपनी बेटी का कमलेश नाम रखा था । लेकिन प्यार से उसे कममो ही सब बुलाते थे । कैलाश ने स्कूटर पर बेग रखा और झटपट माँ बेटी सवार हो गई । ममता थोड़ा बड़बड़ाई अगर गाड़ी कर लेते तो कौन सा खर्चे का पहाड़ टूट पड़ता । अरे एक नहीं दस जगह फ़ोन किया सबके सब शादियों में व्यस्त हैं ।

 तू बैठ तो सही अपनी फटफटिया पर देख तुझे कैसे एक घंटे में पहुँचाता हूँ .. कैलाश का भी अपना ही अन्दाज़ था । छोटी सी मिठाई के डिब्बे बनाने की फ़ैक्ट्री थी  । ज़्यादा नहीं बस गुज़ारा अच्छे से निकल रहा था । देखते ही देखते स्कूटर हवा से बातें करने लगा । पीछे बैठी ममता ने कहा धीरे चलाइये जनाब कहीं , मायके पहुँचने  की बजाय उपर ही ना पहुँच जाये । दोनों पति पत्नी अपने ही मज़ाक़ पर हंसने लगे । कम्मो हमेशा की तरह आगे ही खड़ी थी ।

  अभी कुछ ओर आगे बढ़े ही थे कि पीछे से तेज़ी से आते ट्रक का सन्तुलन बिगड़ा और कैलाश का स्कूटर देखते देखते एक तेज़ वेग से जाकर गिरा । तीनों के जिस्म अलग अलग दिशाओं में उड़े । कैलाश और ममता ने वहीं दम तोड़ दिया । कम्मो एक घास फूस के ढेर पर जा गिरी और एक दो खरोंचो के अलावा कोई बड़ी चोट नहीं आई । देखते देखते पास की दुकानों से लोग दौड़े चले आये । हादसा बहुत दर्दनाक और भयानक था । पल में एक हँसता खेलता परिवार उजड़ गया था ।

ख़बर पाकर पुलिस आई , कम्मो के नाना और मामा दौड़े आये । बेटी और दामाद के मृत शरीर देकर पिता की छाती फटने को आई । पिता के गाँव में ही दोनों का रीति पूर्वक दाह संस्कार किया । कैलाश के परिवार में सिवाय दूर के चाचा के अलावा कोई नहीं था । माता-पिता दोनों ही छोटी उम्र में चल बसे थे । ज़ाहिर था कम्मो की परवरिश का ज़िम्मा नाना के उपर था ।

कम्मो को जब देखती तो बीमार नानी को अपनी बेटी याद आती । सदमा ज़्यादा दिन तक सह ना सकी और महीने भर में वो भी चल बसी । नाना कम्मो परवरिश के लिए पुरी तरह बेटा और बहू पर निर्भर थे । मामी मालती ने भी सहानुभूति की इस घड़ी में नन्ही कम्मो  पर अपना पुरा वात्सल्य लुटाया । अपने दोनों बच्चे वैभव और निकी के साथ कम्मो की परवरिश करने लगी । शुरू शुरू में सब अच्छा चला लेकिन धीरे-धीरे प्राथमिकताएँ बदलने लगी । तेरे मेरे का फ़र्क़ दिल में उतरने लगा । 




आठ बरस की कम्मो में एक सहायिका नज़र आने लगी । गुडा गुड़िया खेलने की उम्र में बुहारी लगाने लगी । पानी से खेलती खेलती बर्तन माँजने लगी । सूखे कपड़े तारों से उतारतीं उतारतीं तय लगी ।मालती बड़ी चतुराई से किशोरी कम्मो के दिलोदिमाग़ पर हावी होने लगी । नाना और मामा सुबह ही घर से निकल जाते । छोटी सी साईकिल रिपेयरिंग की दुकान पर कब नई नई साईकिले बिकने लगी । नित नया माल आने लगा मामा ने पता ही नहीं चलने दिया । 

कम्मो के पिता की फ़ैक्ट्री और घर बेचकर जो भी पैसा आया सब का सब मामा ने अपना व्यापार बढ़ाने में लगा दिया । बुढ़ा नाना के पास सिवाय चुप रहने के कोई रास्ता नहीं था । बारह बरस तक पहुँचते पहुँचते कम्मो काफ़ी रसोई के काम सीख गई । अब बहुत सी चीजें उसे धीरे-धीरे साफ़ नज़र आने लगी कि मामी माँ नहीं है । यह घर वैभव और निकिता का ज़्यादा है और मेरा कम , मेरी ज़िद पसन्द कभी बड़ी बहन तो कभी छोटी बहन के नाम पर दबा दी जायेगी । 

कम्मो में बहुत शान्त और सरल स्वभाव की लड़की नज़र आने लगी । पन्द्रह बरस तक मामी ने ज़्यादातर काम कममो के हवाले कर ख़ुद नये नये शौक़ पाल लिए । घर के काम करने के अलावा कम्मो अपनी पढ़ाई भी अच्छे से करती । स्कूल के सामने के अस्पताल से जब नर्सों को सामने से आता देखती तो ज़रूर उन्हें देखकर मुस्कराती । ज़्यादा उसे जीवन की दिशाओं का नहीं पता था लेकिन नर्सों को देखकर उसके मन में भी नर्स बनने की कामना पलने लगी । 

अठारह बरस की उम्र तक कम्मो ने अपना स्कूल का सफ़र अच्छे अंकों से पास किया और उसने नाना को अपना लक्ष्य बताया । नाना जानकर बहुत खुश हुए कि कम्मो नर्स बनना चाहती है । लेकिन जैसे ही मामा मामी को इस बात की ख़बर लगी तो घर में जैसे भूकम्प आ गया हो । मालती का स्वर बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था… बाऊजी यहाँ कोई कुबेर का ख़ज़ाना दबा है क्या ,चार साल की पढ़ाई होस्टल किताबें फ़ीस जेब खर्च कहाँ से करेंगे हम , पहले से ही हम तो वैभव के कालेज के खर्चो से दबे पड़े हैं । कम्मो दो साल और अच्छे से घर का काम सीख लें फिर जाये अपने ससुराल वहीं जाकर करें अपने मन की हमसे जितना बन पड़ा हमने कर दिया इससे अधिक हमसे ना होगा । 

मामा की चुप्पी भी पत्नी की बात की सहमति दे रही थी । दूसरे कमरे में बैठी कम्मो के कानों में मामी की पड़ती यह आवाज़ें उसके सपनों का दम तोड़ रही थी । मन में कई बार रोई थी लेकिन आज झर झर बहते आंसुओं को उसने बहने दिया । बीस की दहलीज़ पर पाँव रखते ही सौन्दर्य जैसा स्वयं




कम्मो के पास चलकर आया हो । लम्बा क़द गेहुँआ रंग काले घने बाल गोल गोल आँखें पतली सी नाक फूलों जैसे होंठ सुन्दरता की जैसे कोई मिसाल एक के बाद एक रिश्ते आने शुरू हो गये ।कई लड़के देखने के बाद मामा और नाना को सुजीत जिसका कपड़े का व्यापार था, परिवार के नाम पर सिर्फ़ माँ थी स्वभाव घर बार सब पसन्द आया तो धूमधाम से कम्मो का ब्याह कर दिया । बीस बरस की कम्मो किसी की अर्द्धांगिनी बन घर आँगन में प्यार के फूल खिलाने चली आई ।

 गुणों की खान कम्मो ने आते ही घर का सारा काम सम्भाल लिया । सास को रानी बना दिया और पति को परमेश्वर का दर्जा दे दिया । बाहर की दुनिया से ज़्यादा वास्ता नहीं रखती थी, उसका घर ही उसकी दुनिया था । समय एक सा नहीं रहता साल भर बाद सुजीत को व्यापार में घाटा हुआ लाखों का क़र्ज़ा सिर पर आन खड़ा हुआ । पैसे की क़िल्लत में वो मारा मारा हर अपने के दर जाने लगा । फिर किसी ने उसके कान भर दिये कि कम्मो के पिता की सम्पत्ति बेचकर जो पैसा आया वो कहाँ है ?? पत्नी को कहो जाकर अपना हिस्सा माँगे । अपनी सारी मुसीबतों का पल में ही तोड़ देख सुजीत की आँखें लालच से भर गई … आँगन में ही छुपा था ख़ज़ाना और उसने छान मारा सारा ज़माना !!

मौक़ा देखते ही उसने कम्मो से बात की तो उसने बिना देर किए साफ़ इनकार कर दिया कि उस घर में अब उसके लिए कुछ नहीं है । सुजीत भी कहाँ हार मानने वाला था उसने एक नहीं दो तीन बार उसे मायके भेजा और हर बार वो बिना बात किये बस सबसे मिल कर आ गई । वो जानती थी उस घर में बार-बार जाना पानी में लाठी मारने के बराबर है । पत्नी का सहयोग ना मिलता देख माँ ने सलाह दी इसे कहीं बाहर घुमाने ले जा । खिला पिला कुछ ख़रीदारी करा शायद अकेले में तेरा दर्द समझ जाये । सुजीत को सुझाव अच्छा लगा और वो दो दिन के लिए कम्मो को शहर घुमाने ले गया ।

 फूल उगाने के लिए ज़मीन तैयार करने की कोशिश करने लगा । कम्मो पुरा दिन बहुत खुश रही । बरसो बाद उसे ऐसी ख़ुशी मिली थी । घर लौटते हुए वापिसी में वो कुछ खाने के मक़सद हाईवे पर बने एक ढाबे पर रूके । वहाँ सुजीत ने कम्मो से बड़े प्यार से समझाया कि वो बहुत मुसीबत में है और वो जाकर अडिग होकर अपना हिस्सा माँगे । पति के मुँह से फिर से वही बात सुनकर कम्मो ने एकटक जवाब दे दिया एक नहीं हज़ार बार भी कहोगे मेरा जवाब ना ही है । 

सुजीत सुनकर झल्ला उठा पागलों की तरह इधर-उधर घूमते हुए बड़बड़ाने लगा । इसे मेरी अहमियत का अहसास नहीं है । पता चल जायेगा इसे अगर छोड़ कर चला जाऊँ । ऐसा विचार मन में आते ही एक विकृत सा विचार मन में कौंध गया क्यूँ ना थोड़ी देर के लिए इसे अकेला छोड़ कर जाऊँ क्या पता इसकी अक़्ल टिकाने आ जाये । यह सोचते ही वो एक योजना लेकर चारपाई पर बैठी कम्मो के पास आया और बोला कि यहाँ से पन्द्रह मिनट की दूरी पर उसका एक दोस्त रहता है वो उसे कुछ पैसे देने के लिए तैयार है । वो खाना आर्डर करें वो एक घंटे में वापिस आ जायेगा ।




 कम्मो ने ज़िद की कि उसे भी साथ ले जाये लेकिन वो अभी आता हूँ कहकर जल्दी से गाड़ी लेकर निकल गया । आधे पौने घंटे तक गाड़ी चलाने के बाद उसे बाज़ार की कुछ रौनक़ नज़र आई तो उसी तरफ़ निकल गया । सामने भटूरे छोले का ठेला देखकर उसकी भूख मचल उठी । थोड़ा वक़्त भी बिताना था तो एक प्लेट का आर्डर दे दिया । तभी उसके कंधे पर पीछे किसी ने हाथ रखा तो देखा पुराना दोस्त खड़ा था । उसने आग्रह किया कि पैक करवा कर ले चलते हैं , पीछे ही उसका छोटा सा घर है अकेला रहता है वहीं बैठकर खाते हैं । सुजीत के दिमाग़ में अकेली बैठी पत्नी घूम रहीं थीं । आधे घंटे में ही वो लौट जायेगा यह सोचकर वो चल दिया दोस्त के घर.. अभी गाड़ी में बैठा ही था कि माँ का फ़ोन आया कि कब आ रहे हैं ?? नौ बज जायेंगे यह कह कर फ़ोन गाड़ी में ही रख दिया । सालो बाद मिले यार की आवभगत में दोस्त ने शराब की बोतल भी खोल दी । सुजीत ना ना करने के बावजूद भी पीता गया । पेट में खाना नशे में चूर थका हुआ जिस्म कुछ ही देर में लुढ़क गया और देखते देखते गहरी नींद में सो गया ।

  पति को निकले एक घंटे से ज़्यादा समय हो चुका था ।  कम्मो उसी राह में टकटकी लगाये बैठी थी । ढाबे वाला बाबा भी सब देख रहा था । जब दो घंटे तक पति नहीं आया तो बाबा ने आकर कम्मो से सारी बात पुछी । उसने बताया कि घंटे भर में लौट आऊँगा कह कर गये थे ना जाने कहाँ रह गये । बाबा ने कहा तो बेटी फ़ोन कर लो ।

कममो -मेरे पास फ़ोन नहीं है बाबा !

बाबा-नम्बर याद है ?

कममो-हाँ याद है

बाबा – तो यह लो मेरा फ़ोन और जब तक वो नहीं उठाता निरन्तर करती रहो

कममो – धन्यवाद आपका बाबा




यह क्या सुजीत फ़ोन उठा ही नहीं रहा था । अब डर के साथ पति की ख़ैरियत की चिंता भी सताने लगी । देखते देखते अन्धेरा बढ़ने लगा । कुछ ओर ना सुझा तो अपनी सासु माँ को फ़ोन मिलाया । तो उसने बताया कि उसकी बात हुई है और वो सही सलामत हैं और जल्दी लौट आयेगा चिंता मत करो । पति सही है यह जानकर मन को राहत मिली । फिर यह सब उसने क्यूँ किया ?? कहीं उसे सताने के इरादे से तो नहीं ?? यह ख़याल आते ही कम्मो का दिल बैठ गया । पति की इस घिनौनी हरकत से उसकी आत्मा दर्द और पीड़ा से भर गई । जिसे उसने ह्रदय से प्रेम किया उसने चंद रूपयों के लिए उसे यह सजा सुनाई ??  अब तक रात के नौ बज चुके थे । बाबा भी ढाबा बंद करने की तैयारी में था । ना जाने कितने लोगों की अच्छी बुरी नज़र कम्मो पर पड़ी ।तभी आख़िरी गाड़ी वहाँ आई । पति पत्नी दोनों डाक्टर थे । उन्हें भी कम्मो की बाबा से सारी कहानी पता चली । निकलने से पहले उन्होंने कम्मो को कहा कि वो चाहें तो उनके साथ चल सकती हैं सुबह वो उसे उसके गाँव छोड़ देंगे । बाबा ने कम्मो को कहा बेटी तुम सोच लो अच्छे से वर्ना मेरे साथ मेरे घर चलो । घर में मेरी पत्नी है तुम्हें कोई दिक़्क़त नहीं होगी । कममो उठकर गाड़ी तक पहुँची तो सन्न रह गई..  खुले शीशों से साफ़ आवाज़ आ रही थी । लगता है कोई अनपढ़ गँवार है पति बीच राह में ही छोड़ गया है । हम अपने ही घर रख लेंगे नौकरानी तो हम भी कब से ढूँढ रहे हैं । डाक्टर की पत्नी की इस आवाज़ से कम्मो दौड़ कर बाबा के पास आई और कहने लगी बाबा मैं तुम्हारे संग चलूँगी । आधी रात तक बाबा की पत्नी से बातें करती रही । उसे सारे अपने जीवन की कहानी सुनाई । फिर अकेली बैठी सोचती रही । पति ने अन्धेरे में छोड़कर हज़ारों उसके भीतर चेतना के दीये जला दिये थे । कम्मो पहली बार ख़ुद से मिली थी । अपने बहते आंसुओं के पीछे छिपी अपनी उस शक्ति को भी पकड़ने लगी । उसने उस रात अपने अस्तित्व और नारीत्व दोनों का मान बचाने की अपने भीतर प्रतिज्ञा ली । वो कम्मो जो दूसरों में अपना सहारा ढूँढती रही आज वो अपना सहारा ख़ुद बनने को तैयार थी । उधर आधी रात को पति की नींद खुली तो पहला ख़याल उसे  कम्मो का आया । डर और चिंता में उसका शरीर काँपने लगा । पश्चाताप और आत्मग्लानि से उसके आँसू बहने लगे । अपनी नीचता पर उसे स्वयं पर धिक्कार आने लगा । गाड़ी में बैठते ही उस नम्बर पर फ़ोन करने लगा जिस पर पत्नी ने कई बार फ़ोन किया था । तेज स्पीड से आधे घंटे में ढाबे के बाहर खड़ा था । सुबह के पाँच बजे जब बाबा और कम्मो निकलने के लिए तैयार हुए तो अम्मा ने पूछा कि क्या सोचा बेटी कहाँ जाओगी नाना के घर या पति के घर ?? मैं अपने घर अपने पति के पास जाऊँगी  । एक स्त्री के लिए उसके पति के घर से बढ़कर कोई सुरक्षित घर नहीं यह मैंने एक रात में जान लिया ।अंधेरे में छोड़कर उसने मुझे बहुत उजाला दिखाया अब उसे रोशनी में लाना मेरी ज़िम्मेदारी है । अम्मा ने आशीर्वाद देते हुए कहा हमेशा ख़ुश रहो बेटी !! ढाबा पर पति की गाड़ी देखकर वो बाबा को धन्यवाद देकर गाड़ी की पिछली सीट पर बैठ गई । हफ़्ते भर तक सुजीत पागलों की तरह बीवी की माफ़ी के लिए उसके आसपास घुमता रहा और आख़िर एक रात को रो पड़ा । आत्मा पर पड़ा बोझ उसे खायें जा रहा था । कम्मो ने आख़िर एक शर्त पर पति को माफ़ करने की बात कही कि वो पढ़ना चाहतीं हैं नर्स बनकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है । सुजीत पत्नी की ख़ुशी के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार था । कम्मो ने जैसे ही अपनी नर्स की डिग्री ली तुरंत उसे एक अच्छे अस्पताल में नौकरी मिल गई । और फिर एक सुबह आपरेशन थियेटर में चेहरे से मास्क हटाते ही सामने खड़े डाक्टर ने कहा मैंने तुम्हें कहीं देखा है ?? मैं वहीं ढाबे वाली लड़की हूँ सर जिसे आप अपने घर की नौकरानी बनाना चाहते थे । मुझे स्वावलंबी बनाने में काफ़ी हद तक आपकी पत्नी का भी योगदान रहा है । डाक्टर हैरानी से कम्मो की ओर देख रहा था और कम्मो वहाँ से मुसकरा कर निकल गई

स्वरचित कहानी

अभिलाषा कक्कड़

 

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