काला दिन – मृदुला कुशवाहा

1996 में, जब मैं तीन या चार साल की थी एक दिन मैंने सुना कि पापा घर आ रहें हैं तो, मैं और मेरे भैया दोनों बहुत खुश हुए थे ! ज्यादा खुशी तो मुझे अपने नौ महीने के छोटे भाई और मम्मी से मिलने की थी । मेरे पापा भारतीय सेना में थे और सीमा पर तैनात थे । मम्मी छोटे भाई को लेकर ,पापा के साथ ही रहती थीं ।  

उस दिन अचानक रोने की आवाज सुनी तो मेरी नींद खुल गई और मैं हड़बड़ा कर उठकर देखी ।मम्मी फर्श पर लेटी हुई दहाड़ें मारकर रो रही थी और छोटा भाई बड़ी माँ की गोद में था और वह भी रो रही थीं ! भैया भी उठ बैठे ,जो मुझसे सिर्फ 18 महीने ही बड़े थे। 

हम दोनो को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, कि सब लोग क्यों रो रहे हैं ?  

एक कोने में दादा _ दादी बैठकर दहाड़े मार कर रो रहें थे। 

मैं और भैया जब बाहर आए, तो काफी भीड़ थी। 

और जमीन पर बर्फ पर चादर डालकर उस पर कुछ रखा हुआ था। 

मैं बड़े पापा के पास जाकर बैठ गई । , वह भी फर्श पर बैठकर बिलख रहे थे । मैंने कुछ न समझ पाने की वजह से उनसे पूछा ,” बड़े पापा ! मम्मी को क्या हुआ है? और पापा कहाँ हैं ? ” 

तो वह इशारे से बाहर दिखाकर बोले ,” बाहर सोये हैं। “

मैं आश्चर्य से बोली ,” लेकिन पापा बाहर जमीन पर क्यों सोये हैं? “

बड़े पापा बोले ,” बेटा ! तुम्हारे पापा भगवान के पास चले गये हैं। “

और इतना कहने के बाद और जोर जोर से रोने लगे। 

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

 हम पापा का मुँह भी नहीं देख सके थे ,क्योंकि पोस्टमार्टम बाडी थी, और सील बन्द था। 

उसके बाद उसी शाम अंतिम संस्कार के बाद, बड़े पापा भी बेहोश होकर गिर पड़े थे। 

उन्हें लेकर सब हास्पिटल गए, और हमें तो उस समय नहीं पता था कि ये सब क्या हो रहा है? 

 और दो वर्षों के अन्दर ही हमने बड़े पापा को भी खो दिया ।

आज भी वह काला दिन भूलाए नहीं भूलता है। 

बर्फ पर रखी, पापा की डेथ बाडी। 

पापा फौज में थे, और बड़े पापा इंटर कॉलेज में ,सरकारी क्लर्क थे। 

बड़े पापा के बच्चे नहीं थे, और वह हम भाई बहनों को ही अपने बच्चों जैसा समझते थे । 

बडे़ पापा के जाने के बाद , हम सब बेसहारा हो गये। ………

 

 ( अपनी आत्मकथा का एक अंश )

मृदुला कुशवाहा

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