हम तो हैं ही सर्वगुण संपन्न – पूजा मनोज अग्रवाल

 बात उन दिनों की जब हम M.A द्वितीय वर्ष की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे।हमारी बड़ी बहन का विवाह हुए करीब डेढ़ वर्ष बीत चुका था, तो हमारी मां को हमारे भी विवाह की चिंता सताने लगी ….।

        मां ने पिताजी से कहकर पंडित जी को घर बुलवाया ,और हमारा जन्म दिन  व समय बता दिया  …अब भई कंप्यूटर का जमाना था सो  झटपट पत्रिका रेडी  होकर  पंडित जी के हाथ में थमा दी गई ।

  पंडित जी पत्रिका देख कर कुछ जोड़ – भाग करने लगे , तो हमारी मां ने बड़े चिंतित स्वर में  पंडित जी से पूछा…..” पंडित जी , “हमारी इस बिटिया के विवाह ओर इसके ससुराल पक्ष के बारे में कुछ  बताइए “। पंडित जी से कहते- कहते वे हमे बड़ी विचित्र तरीके से देख रही थीं , मानो हमने स्वयं भगवान से सांवला रंग गिफ्ट में मांगा हो …।

   पंडित जी प्रसन्नता पूर्वक बोले ” बहन जी…..बिटिया की कुंडली में चंद्र- शुक्र की युति है सप्तम भाव में , काहे चिंता करती हैं । बालिका का पति गौर वर्ण वाला , सभ्य , आकर्षक  और कुलीन खानदान से होगा …बिटिया के भाग्य में सब सुख हैं …बिटिया राज करेगी राज… ।

     मां ने हमारा सांवला सा चेहरा देख कर हे राम ! का उच्चारण करते हुए ठंडी आह भरी ….।

    पर हम कहां मां के इस ठंडी आह वाले ताने को समझने वाले थे ….हम तो मन ही मन  गद – गद  हुए जा रहे थे की … चलो …. दूल्हा तो हमारा हैंडसम और स्मार्ट होगा  , हमारे मन में तो विवाह को लेकर लड्डू फूट रहे थे, अब तो हमने पंडित जी की बात को मन में गांठ बांध लिया ओर इंतजार करने लगे अपने भावी गौर वर्ण के आकर्षक वर का …।

       अगले ही दिन चाचा जी एक रिश्ता लाए तो उन्होंने वर पक्ष की सभी डिटेल्स मां पिताजी को बताई …. दरवाजे के पीछे से डिटेल्स सुनकर हमे जच गया था की जन्म पत्रिका वाली बात सच होने का समय आ गया है , हमारे ख्याली पुलाव जोरो शोरो से पकने लगे…   । 

 जल्दी ही दोनो  परिवारों के मिलने की डेट फिक्स हो  गई । अगले हफ्ते के पहले ही दिन वे सभी लोग आ पहुंचे हमें देखने ।

 ….अब हम ठहरे सांवले रंग , मध्यम कद काठी  के साधारण से दिखने वालें  और पढ़ने में  भी औसत दर्जे के …….

      पर हमारी नज़रों में तो  हम थे ….सर्व गुण संपन्न ….सुंदर, सुशील , सुघड़ ,खाना बनाने में एक्सपर्ट  ,सिलाई – बुनाई  और नए जमाने के सभी गुणों से  लैस… खैर यह तो हमारी सोच थी …. वास्तविकता तो इससे उलट ही थी जिसे हम और हमारे परिवार से बेहतर कोई न जानता था ….. सभी आगंतुक बड़ी देर से हमारी तरफ देख रहे थे, तो हमने भी बड़ी शालीनता से मुख उठा कर अपने होने वाले भावी वर  के गुणों का  मुआयना कर लिया… दरअसल ये कोशिश इसलिए की गई थी … कि हमने पंडित जी की बात को अकाट्य सत्य  मान लिया था 

और हम जानते थे, कि हमारा विवाह गोरे रंग के आकर्षक लड़के से किसी सभ्य व कुलीन परिवार  में ही होगा  , मुआयना करके हम  निश्चित हो गए थे की ये वही हैं , जिनकी तलाश है हमें…  ।

 

    तभी लड़के के पिताजी ने अपनी शर्ट की जेब से एक छोटी सी डायरी और पेन निकाला  , यह देख कर तो हमारी सिट्टी- पिट्टी गुम हो गई , हमे लगा वे हमसे कही कोई गणित की प्रोब्लेम न सॉल्व करने को कह दें …और गणित में तो  हमारा हाथ वैसे ही तंग था …..हमारे चेहरे पर तो जैसे हवाइयां उड़ने लगी थीं।

      अगले ही पल उन्होंने हमारी ओर सवाल दागा  …बेटा , क्या- क्या आता है तुम्हे ? और  क्या शौक हैं तुम्हारे ?? .. हम तो मन ही मन गणित नाम के भूत से डरे बैठे थे … सो आसान  से प्रश्न सुनकर  हमारा फक्क पड़ा हुआ चेहरा गुलाब की तरह खिल गया  ….

   हमने उत्तर दिया,” जी सब कुछ आता है ” …. 

वे बोले ” सब कुछ….?”  यह कैसा उत्तर है ?

     दरअसल…  लड़का हमे  पसंद था , सो हम उसके सुंदर चेहरे पर मंत्र मुग्ध हो चुके थे , हमने ठान लिया था की आज हम किसी भी हालात में इस रिश्ते को अपने हाथ से फिसलने नहीं देंगे ।

      सोफे के एक कोने से सटी लड़के की माताजी बड़ी  सीधी – साधी  गौ जैसी लग रही थी । उनके प्रश्न भी उन्हीं की तरह  बड़े सरल थे …. खाना बनाना आता है ?? सिलाई कढ़ाई  कर लेती हो ??? 

    आज तो हमारी डिक्शनरी में सिर्फ हां नाम का शब्द रह गया था …क्योंकि ना को तो हम अपने बक्से में बंद कर ताला लगा  आए थे ।

 

  लड़के के पिताजी  शायद खाने के बहुत  शौकीन थे , सो उन्होंने खाने से संबंधित अपना अगला प्रश्न हमारी ओर उछाल दिया  ।

 

” मक्के की रोटी सरसो का साग , वेज बिरयानी और दही के कबाब  बनाना जानती हो   ? ” ….

 

हमने भी न आव देखा न ताव और तपाक  से हां के स्वर में गर्दन हिला दी…जबकि हमे तो साग में प्रयोग होने वाली  पत्तियों का ज्ञान भी  न था …बिरयानी व दही कबाब  तो हमे अपने नाम से ही डरा रहे थे । हम अंदर ही अंदर  डरे सहमे से…कही अब ये महाशय हमसे इन सबकी  रेसिपी ही न पूछने बैठ जाएं ….

 

हमारा ऐसे इंटरव्यू चल रहा था मानो हम किसी  पांच सितारा होटल के वरिष्ठ शेफ पद के लिए चयनित किए जा रहे हों .. …। 

    इधर उस लड़के को भी शायद हम पसंद आ गए थे वह हमारे  हाव – भाव से हमारी व्यथा को समझ  गए थे । तभी  उन भयंकर प्रश्नों  के बाण वर्षा के  प्रहार से बचाने के लिए , वे हमे अकेले में कुछ बात करने के लिए अपने साथ बाहर ले गए  ….अब हमारे कलेजे में थोड़ी ठंडक पड़ गई थी   ।

 

वर पक्ष ने हमे पसंद कर लिया था , हमारी तो  चांदी हो गई थी , मुंह मांगा वर जो मिल रहा था …। अगले माह की 22 तारीख को हमारी शादी की तारीख पक्की हो गई …. अब हमे यह चिंता सता रही है  कि हमारी धड़ाधड़ हां पर हां ….. अब ससुराल में क्या गुल खिलाएगी  …।

      पर जैसा की आप सब जान  गए होंगे कि हम तो हैं ही ….सर्व गुण संपन्न ….. तो सब ईजीली मैनेज कर लेंगे…..  जब ओखल में सिर दे ही  दिया  है  तो मूसल से क्या डरना ….

   

   समाप्त

स्वरचित मौलिक

पूजा मनोज अग्रवाल

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!