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होनी अनहोनी – प्रीति सक्सेना

सुबह से घर में चहल पहल शुरु हो चुकी है, घर के लोगों का आगमन शुरु हो गया है, ममता के बेटे की सगाईजो है आज, आज तो खुशी जैसे फूट फूटकर उसके चेहरे से बरस रही है, जाने कबसे इस दिन का इंतजार था, सच भी तो है…… जिस दिन एक मां  बेटे को जन्म देती है, उसी दिन से उसे अपनी अनदेखी बहू का भी इंतजार रहने लगता है, ममता की आंखों ने भी न जाने कितने सपने संजोए थे अपनी आंखों में, मेरी बहू ऐसी होगी, वैसी होगी, लाखों में एक है मेरा बेटा, बहू तो मेरी करोड़ों में एक लाऊंगी!!

    ममता के पति   ज्योतिरादित्य शर्मा जी शहर के जाने माने एडवोकेट थे, लक्ष्मी की अपार कृपा बरसती थी उनके घर  आंगन  में, विशाल भवन, ढेरों गाड़ियां, क्या कमी थी? कोई नहीं बता सकता था!!

     बंगले के पीछे एक छोटा सा आउट हाउस था, जिसमें  वकील साहब के जूनियर, रहा करते थे, दोनों साथ ही पढ़े थे, एक दिन कोर्ट में टकरा गए, उन्होंने अपने घर में ही रहने का ऑफर दिया जिसे दुबे साहब ने मान लिया!!

सारे केस की तैयारी एडवोकेट दुबे ही करते थे, परिवार के नाम पर एक बेटी ही थी मान्या जो एक स्कूल में टीचर थी, सीधी साधी मासूम सी मान्या, अपने पिता के साथ , घर की पूरी जिम्मेदारी उठाए थी, मां को बचपन में ही खो चुकी थी, मितभाषी मान्या, बहुत कम जाया करती थी कोठी में!!

   आदित्य  एक इंजीनियर था और एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करता था, माता पिता दिल्ली में थे, आदित्य बैंगलोर में जॉब में था!!

 न जाने क्यों,आदित्य बहुत बैचेन था, वजह तो खुश होने की थी, आज उसकी सगाई थी, पर उसे  मान्या 

से पहली मुलाकात बार बार याद आ रही थी… पहली बार, मिलने के बाद भी एक अलग सा अपनापन महसूस हो रहा था , कारण वो खुद समझ नहीं पा रहा था!!




उसे याद आया वो दिन जब मान्या से पहली बार वो मिला था..

घर के बगीचे में,एक सुन्दर मासूम लड़की को देखकर आदित्य को शरारत सूझी, उसने जोर से चिल्लाकर कहा,

” माली काका चोर घुसा है बगीचे में..

 तुरंत वो लड़की दोनो हाथ ऊपर करके बाहर आ गई

  ” देखिए मैं चोर नहीं हूं मैं तो दुबे जी की बेटी मान्या हूं, पूजा के लिए थोड़े से फूल लेना चाहती थी, इसलिए बगीचे में आ गई, माफी चाहूंगी, आइंदा से नहीं आऊंगी, आप किसी को मत बुलाइए “

 कहते कहते उसके दिए जैसी बड़ी बड़ी आंखों से आंसुओं की बूंदे टपकने लगीं, आदित्य घबरा सा गया…..

” अरे अरे… आप रोइए मत, मैं तो बस ऐसे ही मज़ाक कर रहा था, जानता हूं आप दुबे अंकल की बेटी हैं, आपसे मिला नहीं हूं नाम भी नहीं जानता था, इसीलिए थोड़ा मज़ाक कर बैठा, माफ कीजिए अगर बुरा लगा हो तो..”

आदित्य के बोलने का ढंग ऐसा था कि मान्या को हंसी आ गई और वो अपने कौटेज की तरफ भाग गई!!

आदित्य मां के पास पहुंचा..

        ”  मां दुबे अंकल की एक बेटी है आपने बताया नहीं “

” उसमें बताना क्या, बेटी है न” क्यों क्या हुआ?

” दरअसल मुझे तो मालूम ही नहीं था “

” चलो अब तो मालूम हो गया न, जाओ अपनी शाम की तैयारी देखो “




    ” मम्मी उसकी शादी नहीं हुई “

” सुना है जिस दिन बारात आनी थी उसी दिन उस गाड़ी की दुर्घटना घटी और इसका दूल्हा नहीं रहा,दुल्हन बनीं बैठी रह गई बेचारी “

    आदित्य का दिल दहल गया, इतनी छोटी सी उम्र में इतना बड़ा दुख, ईश्वर भी कैसे कैसे खेल खेलता है!!

      शाम होते होते सारा घर बिजली की छोटी छोटी झालरों की रोशनी से जगमगा उठा, मेहमानों का आगमन शुरु हो गया, लड़की वाले भी आ गए, ममता ने आदित्य के दोस्तों को ऊपर भेजा आदित्य को लाने के लिए! आदित्य किसी रियासत के राजकुमार की तरह दिखाई दे रहा था, मुस्कुराता हुआ जैसे ही उसने सीढ़ियों पर पहला कदम रखा, उसके पैरों की जूती अचानक मुड़ गई और वो ऊपर से नीचे गिरता चला गया, चीख पुकार मच गई, तुरंत उसे हॉस्पिटल ले जाया गया !!

  सारे मेहमानों को आदर सहित विदा कर दिया गया, हॉस्पिटल में होने वाली दुल्हन रश्मि और उसके माता पिता और कुछ नज़दीक लोग ही थे, ममता के आंसू रुक नहीं रहे थे…. अचानक ये कैसी विपदा आ गई… मेरे हंसते खेलते बच्चे को किसकी नज़र लग गईं, प्रभु मेरे बच्चे की रक्षा करो!!

    ऑपरेशन थियेटर का दरवाजा खुला, डॉक्टर निकले,

” ऑपरेशन अच्छे से हो गया, कोई चिंता की बात नहीं”

आदित्य को रूम में शिफ्ट कर दिया गया था, होश में नहीं था वो अभी!! ज्योतिरादित्य जी ने सभी को वापस जाने के लिए कहा, यहां रुकने का कोई औचित्य भी तो नहीं था!!




    आज आदित्य हॉस्पिटल से घर आ चुका था, पैर में हल्की सी लचक थी, फिजियोथेरेपी चल रही थी, उम्मीद थी जल्दी ठीक होगा!!

    एक बात सभी को स्पष्ट दिखाई दे रही थी..

होने वाली बहुरानी और उनका परिवार का आगमन करीब करीब बंद हो गया था, असलियत समक्ष आ रही थी, पर फिलहाल सभी को सिर्फ… आदित्य की चिन्ता थी!!

आज आदित्य अपनी व्हील चेयर चलाता बगीचे में आया, मान्या वहीं मिली.. उसे देख तुरंत पास आ गई, हाल चाल पूछा.. न जाने क्यों आदित्य को उसका साथ बहुत भाता था.. दूसरी ही मुलाकात थी पर लगता था, काफ़ी दिनों से पहचान है !!

        अब तो आदित्य और मान्या रोज मिलते… एक दूसरे को बहुत नज़दीक से जानने लगे,

मान्या को देख आदित्य के चेहरे पर अलग सी रौनक आती जिसे ममता और ज्योतिरादित्य जी ने भी महसूस किया..

ममता जी मान्या को अपनी बहू के रुप में देखने तो लगीं पर संकोच भी हो रहा था, मान्या के पिता से उसका हाथ कैसे मांगे, वैसे, आदित्य पूरी तरह ठीक भी नहीं हुआ था, दुबे जी उन्हें गलत न समझ लें यह भी डर था!!

   आदित्य के मन की जानने के बाद ममता जी और ज्योतिरादित्य जी ने, दुबे जी से मान्या का हाथ मांगा जिसे दुबे जी ने सहर्ष स्वीकार किया, मान्या के जीवन को नए रंग मिले , वहीं आदित्य को सही जीवनसाथी मिला!!

   क़िस्मत क्या रंग बदलती है, भाग्य में जिनका जोड़ा बना है आखिर में वो मिल ही जाते हैं!!

प्रीति सक्सेना

इंदौर

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