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छोटी बहु! अपनी जिठानी से ही कुछ सीख ले लो…. – सीमा रस्तोगी 

“शक्ति बहु! बाहर आओ, देखो ताई जी वापस जा रहीं हैं! मालती ने अपनी छोटी बहु शक्ति को आवाज लगाते हुए कहा.

“जी मम्मी जी! और शक्ति ने कमरे से बाहर आकर ताई जी के चरण-स्पर्श कर लिए.

“बहु दूधो नहाओ पूतों फलो! लेकिन बहु! अगर हमारे पास करूणा की तरह जरा देर बैठतीं तो हमको और भी ज्यादा अच्छा लगता!” ताई जी ने आशीर्वाद के साथ मुस्कुराते हुए अपनी बात भी रख दी।

“जी ताई जी! और उनके जाते ही शक्ति फिर से अपने कमरे में चली गई….

और करूणा नाश्ते-पानी के सारे बर्तन समेटने लगी….

शक्ति की शादी को दो महीने के ऊपर हो गए थे, लेकिन उसने अभी तक शायद इस घर को दिल से अपनाया नहीं था, क्योंकि वो ना तो किसी आगंतुक के साथ बैठकर बात-चीत करती और ना ही करूणा की रसोई में किसी प्रकार की मदद करने का प्रयास करती, उसका पति कौशल नौकरी के कारण बाहर रहता था और जल्दी ही शक्ति भी उसके पास जाने वाली थी… लेकिन मालती को शक्ति का ये व्यवहार बहुत अजीब सा लगता, क्योंकि उसकी बड़ी बहु करूणा बहुत ही ज्यादा व्यवहार-कुशल थी और सभी  जान-पहचान वालों के साथ आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करती,  करूणा के व्यवहार की लोग-बाग दिल खोलकर प्रशंसा करते, “वास्तव में बहु हो तो करूणा के जैसी! और मालती चाहती थी कि शक्ति भी सबके दिलों पर इसी तरह से राज करे.. लेकिन उसको इन सब बातों से कोई मतलब ही नहीं था, वो तो बस अपने कमरे में ही बैठी रहती, मोबाइल चलाती रहती, सिर्फ खाने-पीने के समय बाहर निकलती और फिर कमरे में बंद हो जाती…..मालती का स्वभाव ज्यादा टोका-टाकी का था ही नहीं, इसलिए वो शक्ति से भी कुछ नहीं कहती, लेकिन उसने फिर भी एक बार शक्ति को समझाने का प्रयास करने की सोचा…

और उसी दिन शाम को जब शक्ति चाय के समय बाहर आई, तो मालती से रहा नहीं गया और उसने शक्ति को अपने पास बिठाया और बड़े प्यार से हाथ पकड़कर बोलीं “शक्ति बेटा! सबके साथ बैठकर हंसा-बोला करो, अच्छा लगता है, कोई हमारे खाने-पीने का भूखा नहीं होता, हां व्यवहार का आकांक्षी जरूर होता है, तुमने इतने दिनों में ये ध्यान दिया कि नहीं दिया कि करूणा हर आने-जाने वाले के साथ कितना आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करती है और सभी लोग उसके इस स्वभाव की कितनी प्रशंसा करते हैं, यहां तक कि तुम्हारे मायके वाले भी करूणा के व्यवहार की प्रशंसा करते हैं! करते हैं कि नहीं तुम्हीं बताओ? मालती ने प्रश्नात्मक दृष्टि से शक्ति की ओर निहारा.

“जी मम्मी जी! करते तो हैं सभी लोग भाभी की प्रशंसा!




“तो मैं चाहतीं हूं कि लोग तुम्हारी भी इसी तरह से प्रशंसा करें, क्योंकि अब ये घर तुम्हारा भी है, सिर्फ मेरा और करूणा का ही नहीं, अब इस घर पर तुम्हारा भी उतना ही अधिकार और जिम्मेदारी है, जितनी कि मेरी और करूणा की, तुम हम लोगों के साथ भी ज्यादा घुलती-मिलती नहीं हो, बल्कि मेरा मन तो यही करता है कि तुम हम लोगों से भी घुलो-मिलो और जो भी तुम्हारे घर आए, उसके साथ भी तुम मुस्कुराते हुए सम्मान पूर्वक व्यवहार करो और हम लोगों के साथ भी प्रेमपूर्वक उठो-बैठो!

“लेकिन मम्मी जी! मैं तो थोड़े दिनों में बाहर ही चली जाऊंगीं और फिर मैं तो ज्यादा बातें भी नहीं कर पातीं हूं!

“तब तो शक्ति बेटा! तुमको और भी ज्यादा प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिएं, कि जिससे लोग तुम्हारे आने की बाट जोहें और ज्यादा बातें करना ही जरूरी नहीं है, सिर्फ पास में बैठकर सम्मान देना भी बहुत जरूरी होता है, तुमने देखा ना कि आज ताई जी ने क्या कहा! मैं बिल्कुल भी नहीं चाहती कि लोग करूणा से तुम्हारी तुलना करके तुमको कम समझें, माना कि बेटा बहुएं धान की पौध की तरह होतीं हैं, जो एक जगह से दूसरी जगह रोपी जातीं हैं और उनके जमने में समय लगता है, लेकिन एक बार जमने के बाद बहुत अच्छी फसल होती है, चार दिनों बाद तुम चली ही जाओगी, तो लोगों के दिलों में अपने प्यार की अमिट छाप छोड़कर जाओ! मालती ने बड़े प्यार से शक्ति का चेहरा निहारा

 

“जी मम्मी जी! मैं कोशिश करूंगीं!” शक्ति ने खैर नम्रतापूर्वक कहा.

“और शक्ति बेटा! एक बात और करूणा की रसोई में भी मदद करवाया करो, वो बेचारी अकेले रसोई में जुटी रहती है, तुमसे कोई भी काम के लिए नहीं कहती, लेकिन उसको भी तो महसूस होने दो कि उसकी देवरानी आ गई है!”

“लेकिन मम्मी जी मैं क्या करूं! मुझको कोई काम करना आता ही नहीं!” शक्ति मायूसी से बोली




“तब तो बेटा, तुमको और ज्यादा करूणा के साथ मदद करने की कोशिश करनी चाहिएं, जिससे जब तुम कौशल के साथ जाओ, तो खाना-पीना बनाकर खिला सको, वरना तो बड़ी दिक्कत हो जाएगी, कहां तक बाहर का खाओगी!” मालती बड़े प्यार से समझा रही थी और शक्ति की समझ में भी आ रहा था…

“सॉरी मम्मी जी! मैंनै इस तरह से तो सोचा ही नहीं, लेकिन अब आपको शिकायत का बिल्कुल मौका नहीं मिलेगा! शक्ति ने मालती से वादा किया.. और मन ही मन संकल्प लिया कि वो मम्मी जी के कहे अनुसार अपना स्वभाव बिल्कुल बदल लेगी, क्योंकि सचमुच “अब ये घर उसका भी है।

और उसके बाद तो शक्ति तीन महीने और रही, उसने अपने स्वभाव को बिल्कुल परिवर्तित कर लिया और अब तो हर आगंतुक यही कहता कि “वास्तव में बहुएं हो तो मालती के जैसी, दोनों एक से बढ़कर एक! मालती अपनी दोनों बहुओं की प्रशंसा सुनकर मन ही मन बहुत खुश होती.. और अब तो शक्ति ने इस घर-परिवार को पूरे तन-मन से अपना लिया था, जब वो कौशल के साथ गई, तो मालती और करूणा के गले लगकर बिलख उठी… और मालती और करूणा की आंखें शक्ति के प्यार से छलक उठीं….

ये कहानी स्वरचित है

मौलिक है

दोस्तों! जरूरी नहीं कि बहुएं हमारी बात ना सुनें, अगर बहुओं को अगर प्यार और मधुरता से समझाया जाए, तो वो आपकी बातों को मान भी जाती हैं, जैसा कि मालती ने किया, इस विषय पर आपको मेरी कहानी कैसी लगी, लाइक और कमेंट्स के द्वारा अवश्य अवगत करवाइएगा और प्लीज मुझको फॉलो भी कीजिएगा, क्योंकि आपका एक-एक फॉलो मेरे लिए बहुत ज्यादा मायने रखता है।

आपकी सखी

सीमा रस्तोगी 

 

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