अपशगुनी (भाग 3 ) – डॉ. पारुल अग्रवाल : moral stories in hindi

moral stories in hindi : एक दिन ध्रुव नहीं आया,प्राची ने फोन किया तो अमन ने बताया कि उसको तेज़ बुखार है। प्राची से रहा नहीं गया, किसी तरह शाम को बाकी बच्चों के जाने के बाद वो अपनी चार साल की बेटी रिया के साथ सुमित्रा जी के घर पहुंच गई। ध्रुव उसको देखकर तुरंत उसकी गोदी में आ गया। रिया से भी वो बहुत हिलमिल गया था।वो अभी भी ज्वर में तप रहा था। प्राची ने पूरी रात उसकी देखभाल की। अगले दिन ध्रुव की हालत में सुधार था। अमन भी प्राची से बहुत प्रभावित था। उसने अपनी मां के सामने प्राची से शादी का प्रस्ताव रखा। 

उसके इस प्रस्ताव को सुमित्रा जी ने नकार दिया क्योंकि प्राची के स्वयं के भी चार साल की बेटी थी और एक दुर्घटना में वो भी आज से दो साल पहले अपने पति को खो चुकी थी। उसके सास ससुर और देवर ने उसको ही अपशगुनी कहकर ससुराल से निकाल दिया था। यहां तक की उसकी बेटी से भी कोई वास्ता नहीं रखा था।

अमन का इस तरह की बातों में कोई विश्वास नहीं था। उसने सुमित्रा जी को बोला अगर प्राची अपशगुनी है तो फिर तो वो और उसका बेटा ध्रुव भी हैं क्योंकि वो तो जिंदा है और पत्नी तो उसने भी खोई है। ऐसे ही ध्रुव के जन्म के छः महीने के अंदर ऋचा चल बसी। 

अमन की इन बातों ने सुमित्रा जी को निरुत्तर कर दिया था पर उन्होंने फिर भी यही कहा कि वो खुली आंखों से देखते हुए मक्खी नहीं निगल सकती। वो इस तरह के ग्रहों वाली लड़की जो कि खुद भी एक लड़की की मां है, उससे अपने बेटे अमन की शादी नहीं कर सकती।

उनका ये भी मानना था कि अगर उसके खुद के कोई बच्चा ना होता तब भी वो कुछ सोचती पर उसका खुद का बच्चा वो भी लड़की,जिसकी सारी ज़िम्मेदारी भी उन लोगों को उठानी पड़ेगी कभी अपनी बहू नहीं कर पाएंगी। अमन ने फिर भी कहा कि मां आप एक औरत होकर दूसरी औरत का दर्द नहीं समझ रही पर सुमित्रा जी ने उसकी कोई बात नहीं सुनी। अमन ने सुमित्रा जी के इस पुरातनपंथी सोच का पुरजोर विरोध किया। 

सुमित्रा जी ने ध्रुव को फुलवारी भेजना भी बंद कर दिया। प्राची ने फोन करके पूछा तो उसको भी बड़े रूखे शब्दों में बोल दिया कि उसका ध्यान वो रख सकती हैं अब यहां फोन करने की जरूरत नहीं है। उधर ध्रुव कुछ कह तो पाता नहीं था पर प्राची को याद करता था।

ध्रुव की हालत और सुमित्रा जी की ज़िद को देखते हुए अमन बिना किसी से कुछ कहे प्राची से कोर्ट में विवाह कर उसे और उसकी बेटी को अपने घर ले आया। सुमित्रा जी के पति ने तो उन लोगों को खुशी-खुशी आर्शीवाद दे दिया पर सुमित्रा जी ने प्राची को नहीं स्वीकारा। वो जब देखो तब उस पर ताने की बौछार करती रहती। उसके हाथ से बना खाना नहीं खाती। इन सबके बाबजूद प्राची बिना कुछ कहे अपने काम में लगी रहती।

एक दिन सुमित्रा जी का व्रत था, प्राची की बेटी जो कि सिर्फ चार साल की मासूम थी उसने उनके खाने की थाली में से फल का एक टुकड़ा उठाकर खा लिया था। अब ये देखकर तो उनका पारा ही चढ़ गया। उन्होंने खूब हंगामा किया और अपने छोटे बेटे बहू के पास जाने का निर्णय ले लिया। 

अमन ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की और प्राची ने भी अपनी छोटी सी बच्ची की तरफ से काफी माफ़ी मांगी पर सुमित्रा जी टस से मस ना हुई। सबको पता था कि छोटी बहू बहुत तेज़तर्रार है पर उस समय तो सुमित्रा जी को सबसे बड़ी दुश्मन सिर्फ प्राची और उसकी बेटी नज़र आ रही थी।

तब अनिल जी ने धीरे से अमन और प्राची को अपने पास बुलाकर धैर्य रखने की सलाह दी और कहा वक्त सब ठीक कर देगा। आज सुमित्रा जी को प्राची का सभी को अपना मानने वाला स्वभाव और सेवा भाव याद आ रहा था। सुमित्रा जी के पति भी उनकी मनोदशा समझ रहे थे। उन्होंने बड़े बेटे अमन और प्राची को उनको लेकर जाने के लिए फोन भी कर दिया था जिसका अभी सुमित्रा जी को पता नहीं था। अतीत की इन बातों को सोचते-सोचते कब सुमित्रा जी की आंख लग गई उन्हें पता ही ना चला।

सुबह उनको लगा कि कोई बहुत प्यार से उनके पैर सहला रहा है तो देखा कि प्राची बैठी हुई है। सुमित्रा जी को लगा कि वो सपना देख रही हैं पर जैसे ही उन्हें अमन और अपने पति की आवाज़ सुनाई दी तो उन्होंने प्राची से माफ़ी मांगते हुए उसे गले से लगा लिया। बड़े बेटे-बहू,साथ में पोते ध्रुव और प्यारी सी रिया को देखकर सुमित्रा जी के आंसू बहने लगे। उन्होंने रिया को मेरी प्यारी सी गुड़िया कहते हुए गले से लगा लिया।

प्राची ने उनके आंसू पोंछते हुए कहा कि मां आप रोते हुए नहीं डांटते हुए ही अच्छी लगती हैं। हम आपको और पापा की लेने आए हैं आज शाम की ही हमारी फ्लाइट है। आपका घर आपका इंतजार कर रहा है। आज सुमित्रा जी की आंखों से अंधविश्वास की पट्टी पूरी तरह हट गई थी। अब वो बेसब्री से अपने घर लौटना चाहती थी।

दोस्तों कैसी लगी मेरी कहानी?अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। कई बार हम किसी स्त्री के पति की मृत्यु होने पर उसको तो अपशगुनी बोल देते हैं पर जब किसी पुरुष की पत्नी कालगलवित होती है तो उसको कोई कुछ नहीं बोलता। वैसे भी जन्म और मृत्यु तो परमात्मा के हाथों में है फिर हम किसी इंसान को इसके लिए ज़िम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं?कब तक हम इन रुढ़ीवादी बेड़ियों से बंधे रहेंगे।अब समय आ गया है कि हम इन बेड़ियों को काट डालें और इन सब बातों से ऊपर उठ जाएं तभी हम आने वाली पीढ़ी से लिंगभेद की समस्या को दूर कर सकते हैं।

अपशगुनी (भाग 2 ) – डॉ. पारुल अग्रवाल : moral stories in hindi

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

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