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अपेक्षाएँ – जयसिंह भारद्वाज

समाचारपत्र के अंतिम पृष्ठ पर दृष्टि गड़ाए मैं किसी समाचार में खोया हुआ था कि अमृता ने समीप आकर मध्यम स्वर में कहा, “गुरु जी! आइये, तनिक बाहर तो देखिये।”

उत्सुकता से मैंने उन्हें निहारा  तो चेहरे पर मनुहार का भाव दिखा। कमरे से बाहर आकर देखा तो पाया कि आँगन के एक कोने में अम्मा चावल पछोर रही थीं और धीमे धीमे गुनगुना भी रही थीं। अम्मा अपने आप में मस्त थीं।

मैं चुपचाप वापस कमरे में आ गया। पीछे पीछे अमृता भी आ गई। वे बोलीं, “देखा आपने अम्मा को! नातिन की शादी में कितना प्रसन्नचित्त हैं। याद है आपको पंचम की शादी में कितना दुःखी हो गईं थीं।”

एकाएक दो माह पहले का दृश्य मेरी आँखों के सामने आ खड़ा हुआ…

दो माह पहले…

पत्नी की असामयिक मृत्यु के कारण मैं अपने सबसे छोटे भाई पंचम का पुनर्विवाह करने जा रहा था। मैं और अमृता ही विवाह के सभी कार्यक्रमों की तैयारियां कर रहे थे। अन्य तीनों छोटे भाई अपने परिवारों के साथ दूसरे शहरों में व्यस्त थे और बच्चों की अर्धवार्षिक परीक्षाओं के कारण उनमें से कुछ तो इस कार्यक्रम में भाग भी नहीं ले पा रहे थे।

साठ को स्पर्श करती हुई मेरी आयु और इसी आयु की अमृता का रोगी शरीर… मानसिक दृढ़ता ही हम दोनों को इस जिम्मेदारी को निर्वहन करने में सहायक हो रही थी। दृष्टि व श्रवण से अतिक्षीण हो चुकी अस्सी से अधिक आयु वाली अम्मा से हम क्या सहायता लेते.. इसलिए हम दोनों पतिपत्नी ही वैवाहिक व्यवस्था में लगे हुए थे। अम्मा कभी कभी पास आतीं, बैठतीं और देखती रहतीं थीं, कभी कुछ कहती नहीं।

भाई का पुनर्विवाह तो था ही उसकी होने वाली पत्नी का भी पुनर्विवाह था क्योंकि वह ससुराल से निष्कासित एक सद्य:विधवा थी। पुरोहित जी के अनुसार विधवा-विवाह में सात फेरे नहीं लिए जा सकते हैं क्योंकि लड़की एकबार फेरे ले चुकी होती है। इसलिए दोनों परिवारों ने एक मंदिर में वरमाला के बाद गठबंधन करके हवन पूजन करा कर विवाह संपन्न करना सुनिश्चित किया था। तदनुसार कुछ वैवाहिक कार्यक्रमों में कमी भी हो गयी थी।

विवाह निर्धारित होते समय अम्मा को यद्यपि यह बताया जा चुका था कि विवाह कम से कम रीतिरिवाजों को अपनाते हुए सादे ढंग से निबटाया जाएगा तथापि जब पंचम कुछ सम्बन्धियों के साथ मन्दिर के लिए निकलने को हुआ तब अम्मा कभी किसी रीति को लेकर तो कभी दूसरी प्रथा को लेकर प्रश्न करने लगीं। मैं कभी व्यवस्था को देखता तो कभी अम्मा के प्रश्नों के उत्तर देकर उन्हें सन्तुष्ट करने का प्रयत्न कर रहा था। हर बार लगता कि अम्मा मेरे उत्तरों से सन्तुष्ट नहीं हैं। यह बात मुझे व्यथित करने लगी थी। ऐसे ही अम्मा ने एक दो प्रश्न और किये और मैंने उन्हें उत्तरित भी किये किन्तु अम्मा के चेहरे पर न खुशी थी और न सन्तुष्टि थी। यह देख कर मैं उद्विग्न हो उठा था कि तभी अम्मा ने पुनः कहा, “बड़े बबुआ, बरातिन्ह के रोचना टीका भी न करिवहियो का?”




यह सुनते ही मेरे अंदर की अशान्ति बाहर इन शब्दों के साथ निकली, “अम्मा, सब हो रहा है। आप बीच बीच में टोकाटाकी न करिए। पहले से आप ने कुछ कहा नहीं और हर बात में कमियाँ निकाल रही हो। अब मैं गाड़ियों के मंदिर जाने की व्यवस्था करूँ या फिर आपके प्रश्नों के उत्तर देता फिरूँ! और बता भी रहा हूँ तो आपको ठीक भी नहीं लग रहा है। अम्मा! देखो मैं पिछले पंद्रह दिनों से बहुत परेशान हूँ। अब थक भी गया हूँ। मुझे और अधिक न परेशान करो ये बेकार के प्रश्न पूछ पूछ कर।” मेरे स्वर में तेजी थी। यद्यपि बैंड की धुन में किसी अन्य ने तो नहीं सुना किन्तु अम्मा ने अवश्य सुन लिया। उन्हें कम सुनाई पड़ने के कारण हमें उनसे बात करते समय अपने स्वर को तीव्र रखना ही होता है।

अम्मा का चेहरा उतर गया। यह देख कर मुझे अपनी गलती का एहसास तो हुआ किन्तु तीर धनुष से निकल चुका था और अम्मा के हृदय को वेध भी चुका था।

हताशा भरे भाव से मैंने पंचम को अपने पास बुलाया और सारी बात बताकर उसे अम्मा को अपने साथ ले जाने को कहा क्योंकि वैधव्यता के कारण वे विवाहकार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनना चाहती थीं। पंचम ने कहा, “आप परेशान न हों भइया, मैं अम्मा को साथ लिए जा रहा हूँ।”

बारात जाने के बाद मैं पश्चाताप का भार लिए अनमने भाव से आँखें बंद किये लेटा हुआ था कि माथे पर चिरपरिचित स्पर्श का आभास हुआ। उसी दशा में लेटे-लेटे मैंने कहा, “अमृता! प्लीज मुझे एकाकी छोड़ दो कुछ देर के लिए। तब तक आपलोग बहू के आगमन की तैयारियां करें।”

“सब हो रहा है। किंतु आप व्यथित न हों, सब ठीक हो जाएगा। ध्यान दें कि शायद हमसे एक चूक हो गयी है।” अमृता ने मेरे माथे को सहलाते हुए कहा।

“चूक… कौन सी चूक?” तनिक चिंतित स्वर में मैंने कहा।

“अम्मा को अनदेखा करने की चूक।” शांत स्वर में अमृता ने कहा।

“अनदेखा तो नहीं किया हमने अम्मा को… कैसे यह समझा तुमने?”




“आपने यह सोच कर अम्मा से कोई जानकारी साझा नहीं की कि क्यों अम्मा को अनावश्यक रूप से परेशान करना। काम तो आप और मुझे ही निबटाने थे। पूरे प्रकरण में अम्मा चुप रहीं। उन्हें प्रतीक्षा थी कि आप उनसे कुछ पूछेंगे, कुछ राय-मशवरा करेंगे या फिर कुछ बताएंगे उन्हें। किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो वे स्वयं को नेगलेक्टेड महसूस कर रही थीं और शायद इसीलिए बरात की विदाई के समय उनका सब्र टूट गया और आपसे बार बार कुछ न कुछ पूछने लगीं थीं। आपको यह बिल्कुल भी पसन्द नहीं कि कोई आप से प्रश्न करे क्योंकि आप किसी भी काम को जीरो मिस्टेक के साथ पूरा करने में विश्वास रखते हैं।”

माथे पर रखी अमृता की हथेली पर अपनी हथेली रखते हुए मैंने कहा, “एकबार फिर से तुमने सच को पकड़ा है अमृता। हाँ यह चूक तो हो गयी है।”

“कोई बात नहीं अम्मा आपसे बहुत प्यार करती हैं। वे सहज ही आपको क्षमा कर देंगी। आइये, उठिए। मैं चाय लाती हूँ।” अमृता ने कहा और कमरे से बाहर निकल गईं।

उस रात को जब सभी भोजन करके अपने-अपने बिस्तरों पर पहुँच गए तब मैंने अपने अंदर से समस्त साहस को जुटा कर अम्मा की चारपाई की तरफ रुख किया। वे सोई नहीं थीं अभी। मैंने उनके चरणों को पकड़ लिया और रोने लगा। वे उठीं और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,”बड़े बबुआ, आओ इधर बइठो आय के। रोओ मत। आओ बबुआ।”

वहाँ से उठकर मैं उनके पास आया और गोदी में सिर रखकर सिसकने लगा। मेरे चेहरे, सिर और छाती पर हाथ फेरते हुए कहा, “बड़े बबुआ, आज पिताजी होते तो जइसे यह काम निबटायो है न उसे देखकर वे बहुत खुशी होते।”

“अम्मा, आज आप पर मैं चिल्ला बैठा। उसे देखकर क्या पिताजी खुश होते?” सिसकते हुए मैं बोला।

“बबुआ, वे तुम्हें हमसे अधिक अच्छी तरह से जानत रहे। वे हमेशा कहते थे कि हमार बड़े बबुआ हमारे पुण्यों के फल जइसन है। हमें पता है कि तुम अभीतक अपने भाइयों का बोझा ढो रहे हौ… आखिर कब तक! मनई आहिउ तुम भी (मनुष्य तुम भी हो).. गुस्सा आय सकत है तुम्हें भी। कउनो बात नहीं। मन में बोझ न धरौ। ठीक, अच्छा अब जाओ। थक गए होइहौ। जाकर सोई जाओ।” कहकर अम्मा ने मेरा माथा चूम लिया।

इसके बाद जब भतीजी के विवाह की जिम्मेदारी मंझले भाई ने अमृता व मुझ पर डाल दिया तो हमने इसबार हर काम में अम्मा से पूछा और उनको बराबर जोड़े रखा। अमृता ने भी विवाह सम्बंधित छोटे मोटे कामों में उनको इन्वॉल्व किये रखा। पहले अम्मा को नन्हा सा भी काम करता देख कर मैं अमृता को डांट दिया करता था किन्तु अब नहीं। उसी का परिणाम है कि आज चावल पछोरते समय अम्मा अत्यंत प्रसन्नचित्त दिख रही हैं। मेरा यह सोचना गलत निकला कि वृद्धावस्था में माँबाप की अपेक्षाएं बस आराम, दवा और भोजन ही हैं। किन्तु ऐसा नहीं हैं बल्कि वे हमारे साथ हमारी दिनचर्या के सक्रिय सहभागी बने रहना चाहते हैं। उनकी अपेक्षा रहती है कि हम उन्हें समय दें और सुबह-शाम उनके हाल तो पूछें ही साथ ही हम अपने दुःख व सुखद समाचारों को भी उनसे साझा करें। वे अपने आप को हमारे साथ जोड़े रखना चाहते हैं ठीक वैसे ही जैसे हम बचपन में उनसे जुड़े रहना चाहते थे।

      ।।।। इति ।।।।

©जयसिंह भारद्वाज, फतेहपुर, (उ.प्र.)

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