अभिशाप – गणेश पुरोहित 

उसके छ: भाई-बहन थे- पांच बहने और एक भाई। पिता प्राइमरी स्कूल टीचर थे। किराये के एक छोटे से मकान में रहते थे। एक सीमित आमदनी में उनके परिवार का मुश्किल से गुजर बसर होता था। उसकी दो बड़ी बहने थी। पुत्र की आस में माता-पिता ने उसे पैदा किया था। यदि पुत्र पहले आ जाता तो उसका इस संसार में आने का नम्बर ही नहीं आता। चूंकि उसका नम्बर तीसरा था, अत: उसे जन्म से ही उपेक्षा और तिरस्कार मिला था। उसके जन्म के समय पिता ने दीवार से सर फोड़ा था। मां ने उसकी ओर देखा तक नहीं था। उसकी दो बड़ी बहिने कोने में दुबकी परिवार पर आई इस आकस्मिक मुसिबत को भांप कर सहमी- सहमी सी उसे देख रही थी। उस घर को उसकी जरुरत नहीं थी, इसलिए उसकी कोई परवाह नहीं की जाती। बीमार होने पर उसे अस्पताल नहीं ले जाया जाता। उसके नये कपड़े नहीं सिलाये जाते। नई कीताबे नहीं आती। बड़ी बहनों के पहने हुए कपड़े उसे पहनने पड़ते। बहनो की किताबों से ही वह पढ़ लेती। उसने कभी मां-बाप से किसी चीज के लिए जिद नहीं की। जो मिल जाता- खा लेती और पहन लेती। अभावों में उसका बचपन और कैशोर्य बीता। परिस्थितियों ने उसे संतोषी स्वभाव का बना दिया। जब युवावस्था की दहलीज पर पांव रखा, उसकी दोनों बहनो की शादी कर दी गई। विवाह में कोई उत्साह या जश्न का माहौल नहीं था, माता पिता के सर पर एक बोझ था, जिसे उतारना था। जैसे- तैसे, जहां से उधार मिल सकता था, ले कर उसके पिता ने बेटियों के विवाह की जिम्मेदारी निभाई। बेटियों को धक्के दे कर निकालने का परिणाम यह हुआ कि छोटी दीदी एक महीने बाद ही वापिस घर आ गई। बड़ी दीदी भी तकल़ीफ में ही थी, पर घर के हालात देख कर फिर मायके में आ कर बैठने की हिम्मत नहीं कर पाई। अपनी बहनों की दुर्दशा देख उसने ठान लिया था कि वह शादी नहीं करेगी।
बिना अच्छी परवरिश के भी वह सुन्दर दिखने लगी थी। लम्बा कद, गोरा रंग और तीखे नाक नक्श ने उसे बेहद आकर्षक बना दिया था। पढ़ने में अव्वल थी। हर वर्ष उसे स्कॉलरशीप मिलती थी। उसके व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण उसके माता-पिता के चेहरे पर उसे देख कर स्नेह छलकने लगा था। ग्रेजुएशन में प्रवेश के साथ-साथ उसने घर में टयूशन प्रारम्भ कर दी थी। दीदी भी इसमें उसका सहयोग करती थी। घर की आमदनी बढ़ने से मां-बाप को खुशी मिल रही थी। उसने दीदी को बीएड़ करने के लिए प्रोत्साहित किया। एक वर्ष बाद ही दीदी अघ्यापिका बन गई। पिता के चेहरे पर अरसे बाद उसने प्रसन्नता छलकते हुए देखी। अपनी बेटियों के बारे में दूसरों को बतियाते उसके पिता का सीना गर्व से फूलने लगा था।
एमबीए करने के बाद उसका एक कम्पनी में केम्पस प्लेसमेंट हो गया। माता-पिता की खुशी का ठीकाना नहीं रहा। उनकी बेटी इतनी मेधावी निकलेगी, ऐसी कल्पना उन्होंने नहीं की थी। कम्पनी के काम में उसने जी जान लगा दी। घर पर रहती तब भी वह लेपटोप में आंखें गड़ाये रहती। कम्पनी प्रबन्धन उसके काम से बहुत खुश था। उसकी बनाई गई रिपोर्ट प्रशंसा बटोरती थी। वह रात को देर तक ऑफिस में बैठी रहती, क्योंकि घर का वातावरण उसे रास नहीं आता था। एक दिन वह देरी से काम समाप्त कर घर जा रही थी, तभी उसके आगे चल रहे कम्पनी के किसी सीनीयर ऑफिसर के हाथों से कार की चाबी नीचे गिर गई। उसने तपाक से चाबी उठाई और विनम्रता से बोली-’सर, आपकी चाबी !’ वे पीछे पलटे और उसके हाथ से चाबी ले, उसे ऊपर से नीचे तक गौर से देखा। फिर धीरे से बोले, ‘ इतनी देर तक ऑफिस में मत बैठा करो।’ वे महाशय कम्पनी के सीईर्ओ थे- इस कम्पनी के मालिक भी। उन्हें सामने खड़ा देख वह सकपका गई। उसके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला-’ जी ‘। हड़बड़ाहट में वह गुड़ इवनिंग सर कहना भी भूल गई।
कम्पनी के सीईर्ओं से हुई इस संक्षिप्त मुलाकात से वह गदगद हो गई। तेज कदमो से चलती हुई बस स्टॉप पर पहुंची। शायद उसकी अंतिम बस निकल गई थी। अब उसे ऑटो से घर जाना होगा, जो उसे असहज लग रहा था। थोड़ी ही देर में बड़ी सी कार उसके पास आ कर रुकी। ड्राइवर ने फाटक खोल कर उसे अंदर बैठने का अनुरोध किया। वह इस आमंत्रण से चौंक गई, परन्तु जैसे ही उसने कार के भीतर सीईर्ओ साहब को देखा, वह सकुचाते हुए बैठ गई। उसके बैठते ही साहब बोले, ‘ क्या नाम है, तुम्हारा ? ”
‘ जी, मनीषा रस्तोगी !’



‘ तो तुम ही हो मनीषा…. बहुत तारीफ सुनी थी, तुम्हारी… आज मुलाकात हो गई। तुम्हारा काम मैंनें भी देखा है, बहुत इंप्रेश हूं तुम्हारे काम से। अच्छा है, इसी तरह से लगन से काम करती रहो। पर एक बात का ध्यान रखो- समय पर ऑफिस से निकल जाया करो। ‘ कहते हुए वे चुप हो गये और अपने हाथ में पकड़े स्मार्ट फोन में कुछ देखने लगे।
अपना घर आने के पहले ही उसने ड्राइवर से कार रोकने का अनुरोध किया। साहब को थेंक्स कहा और गाड़ी से उतर गई। उन्होंने स्मार्टफोन में आंखें गड़ाये ही गर्दन हिला दी। मनीषा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। छोटा सा सफर उसे बहुत लम्बा लगा था। कार में सिकुड़ कर सिर झुकाये बैठी थी। इतने बड़े आदमी के साथ बैठने की उसे हिम्मत नहीं हो रही थी, पर क्या करती। ऑटो से घर जाने की रिस्क लेने से तो यह अच्छा विकल्प था।
दूसरे दिन फिर उसकी साहब से मुलाकात हो गई। वे उसकी सीट के सामने खड़े थे और वह अपने काम में मशगूल थी। पर जैसे ही उसने अपनी सीट के सामने सीईओ साहब को खड़ा देखा, वह चौंक गई और सकपका कर खड़ी हो गई। ..’.गुड इवनिंग सर ! ” कह कर उसने अपनी आंखें झुका ली।
‘आज फिर तुम्हारी बस छूट जायेगी……समय पर काम खत्म कर निकल जाया करो।’ उन्होंने उसे अच्छी तरह घूरते हुए यह वाक्य कहा, जिसे वह भांप नहीं पाई।
‘ सर, ….. मेरी आखरी बस आठ बजे हैं…..अभी पंद्रह मिनट बाकी है…..मैं अभी पहुंचती हूं।’ कह कर उसने अपना काम समेटना प्रारम्भ कर दिया।
उसे बस मिल गई। उसे संतोष हुआ कि चलो साहब की लिफ्ट से बच गई। बड़े लोगों के साथ बड़ा असहज हो कर बैठना पड़ता है। अगले छ: माह में उसकी साहब से कभी-कभी मुलाकात हो जाया करती थी। वह अभिवादन करती और जवाब में वे मुस्कारा देते। परन्तु छ: माह बाद उसके प्रशंसनीय काम और साहब की अनुकम्पा से उसका स्थानान्तर सीईओ के स्पेशल स्टॉफ में कर दिया। अब सीईओ की केबीन के बाहर पांच छ’ सीनीयर स्टाफ के साथ बैठती थी। इस तरह अब साहब की नज़रों का सामना करना पड़ता था। उसे लगता था उसकी अति साधारण वेशभुषा उसके बदले स्टेटस के अनुरुप नहीं थी। परन्तु वह इसमें बदलाव नहीं चाहती थी, क्योंकि उसके परिवार के अन्य सदस्यों से अलग वह अपने आपको ज्यादा स्मार्ट और फेशनेबल नहीं बनाना चाहती थी।
सीईओ .के साथ काम करने से उसकी निकटता उनसे बहुत बढ़ गई थीं। अक्सर उसे साहब के केबीन में जाना पड़ता था। उसका संकोच धीरे धीरे कम हो गया था, किन्तु ऑफिशियल कार्य के अलावा उनके साथ कोई बात नहीं होती। उसे साहब के साथ दौरे पर भी जानता पड़ता था, पर उसका सारा ध्यान अपने काम पर ही लगा रहता था, अत: साहब उस पर विशेष अनुकम्प क्यों कर रहे हैं, इस रहस्य को वह समझ नहीं पाई थीं।
दिल्ली में सीईओ साहब के साथ उसे पंद्रह दिन रहना पड़ा था। कम्पनी ने जमीन का बहुत बड़ा सौदा किया था, जहां एक साथ कई प्रोजेक्ट आरम्भ करने थे। पूरा स्टाफ काम की अधिकता से अत्यधिक व्यस्त रहता था। इसी व्यवस्तता के बीच एक दिन उसे अपने साथ डिनर करने का आग्रह किया था। उसे लगा- कम्पनी के अन्य कर्मचारी भी डिनर पर आमंत्रित होंगे, परन्तु यह देख कर उसे आश्चर्य हुआ कि उसके अलावा सर ने और किसी को आमंत्रित नहीं किया था। वह साहब के मनोभाव को समझ नहीं पाई और चुपचाप उनके सामने की सीट पर बैठ गई।
साहब ने उसके सामने मीनू का चार्ट पकड़ाते हुए कहा, ‘ आज तुम्हारे पंसद की डिस खायेंगे। ‘ सुनते ही वह चौंक गई। उसे ऐसे सम्मान की उम्मीद नहीं थी। उसने संकोच से सिकुड़ते हुए धीमे स्वर में कहा, ‘ सर !………मैं….ऐसा…..’
उन्होंने उसकी बात काटते हुए सख्त लहजे में कहा, ‘ संकोच मत करो…..फटाफट ऑडर दो….। ‘
उसने ऑडर दिया। खाना आया। वह सिर झुकाये खाने लगी। पर कोर गले में नहीं उतर रहा था। उसे बार-बार पानी पीना पड़ रहा था। उसे इस बात का भी अहसास नहीं था कि वह क्या खा रही है।
वे उसकी मनोदशा को भांप गये थे। अत: उनके मन में जो था उसे साफ साफ शब्दों में कहने की हिम्मत जुटा कर बोले, ‘ मनीषा ! मुझसे शादी करोगी ? ‘
‘क्या ऽऽ ?’ उसके हाथ से चम्मच छूट गया। उसने नज़रे उठा कर उनके चेहरे की ओर देखा। वे एक टक उसकी और देख कर उसके मनोभाव को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे।
‘ यह कैसे सम्भव है सर ?…… मैं बहुत गरीब परिवार से हूं। हमारा कोई स्टेटस नहीं है। …..मेरे मन में आपके प्रति कभी ऐसे ख्याल नहीं आये। मेरे मन में आपके लिए अपार श्रद्धा है….आप मेरे भगवान है….आपने मुझे इतनी ऊंचाई पर ले जा कर बैठाया, उसे मैं अपना अहोभाग्य समझती हूं, किन्तु मुझे आकाश जितनी ऊंचाई नहीं चाहिये सर !………मुझे क्षमा करें, यह बिल्कुल सम्भव नहीं है। ‘ कहते -कहते वह कुर्सी से उठ खड़ी हुई। उसका चेहरा क्रोध और लज्जा से लाल हो गया था।
‘ बैठो ! उन्होंने आदेशात्मक स्वर में कहा, ‘ मैंने प्रपोजल रखा है- तुम्हारे समक्ष इसे स्वीकार करने की बाध्यता नहीं है। …..तुम चाहो तो मेरे प्रपोजल को ठुकरा सकती हो।…… यदि तुम ऐसा करोगी तो इसका तुम्हारे केरियर पर फर्क नहीं पड़ेगा। कम्पनी में तुम्हारा जो स्टेटस है, वही रहेगा। हमारे आफिशियल रिश्ते भी वैसे ही बने रहेंगे। “



वह बैठ गई। उसके भीतर का द्वंद्व उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था। उनके एक वाक्य ने उसे अंदर तक हिला कर रख दिया था। जैसे ही उसने सहमति दी, वह शिखर पर चढ़ कर बैठ जायेगी। फिर……..नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मुझे चकाचौंध वाला संसार नहीं चाहिये। उस संसार में जाने के बाद मेरा मानसिक संतुलन घड़बड़ा जायेगा।…….क्या मालूम वहां ले जाने का प्रस्ताव एक छलावा हो…..धोका हो…. गरीबी का लाभ उठाने का एक बहाना हो।
उसके भीतर से आवाज़ आई, गरीबी से बढ़ कर भयावह यंत्रणा और क्या होती है मनीषा !……सहसा उसे एक घटना याद आई- जब कॉलेज में पढ़ती थीं, तब एक बार क्लास में वह कोई प्रश्न पूछने खड़ी हुई थीं, तब उसकी गली कुर्ती यकायक फट गई थी। पूरी क्लास ठहाके लगा कर हंस पड़ी थीं। तब उसे कितनी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थीं। इस घटना के बाद उसके मन में एक अजीब सा हीन भाव भर गया था। वह कॉलेज में गुमशुम रहती। किसी से बात नहीं करती। गरीबी और अभावों में गुजारे पल एक के बाद उसकी स्मृति पटल पर उभरने लगे। वह विचलित हो गई। उसने साहस कर गर्दन उठाई और सर की ओर देखने लगी। उनके चेहरे पर एक मुस्काराट बिखरी थी। वह बहुत ध्यान से उसके मनोभावों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे।…..वह अधिक देर तक उनसे नज़रे नहीं मिला पाई और झेंप कर फिर नज़रे झुका ली।
एक बात और साचे लो, उसने अपने आप से दूसरा प्रश्न पूछा, क्या तुम पूरी उम्र कुंवारी रहोगी ?….. एक न एक दिन किसी के साथ तो बंधना पड़ेगा। वह व्यक्ति भी यदि धोखेबाज निकला तो ….? एक लड़की के लिए शादी का प्रस्ताव स्वीकार करना एक जोखिम ही रहता है….यदि एक अरबपति के साथ बंध कर ऐसी जोखिम उठाने से हर्ज ही क्या है ? …..तुम उन पर डोरे तो नहीं डाल रही हो…..वे तुम्हें प्रपोज कर रहे हैं, वह भी ससम्मान। उसने एक बार अपनी निगाहें उठाई। उसकी आंखें डबडबा आई। आंखों की कोर से सहसा आंसू ढुलक गये। वह देर तक उनके चेहरे की ओर देखने की हिम्मत जुटा पाई। चेहरे पर उसे स्निग्ध मुस्कान बिखरी हुई मिली, जिसमें छल का कोई अंश नहीं था।
देखो मनीषा, उन्होंने फिर धीमी आवाज में कहना प्रारम्भ किया, ‘ मेरे पास अरबों रुपये की सम्पति है। मैं बिना शादी किये ही जिंदगी गुजार सकता हूं।……. परन्तु मैंने दस वर्ष तक वैवाहिक जीवन जीया है। मैं मानता हूं कि घर में स्त्री की सदैव आवश्यकता रहती है, जो दुख-सुख और प्रत्येक प्रतिकूल परिस्थितियों में पति के साथ खड़ी रहती है। ……पत्नी की मृत्यु के दो वर्ष तक मैंने इस बारें में विचार ही नहीं किया, किन्तु जब से तुम्हें देखा है- तुम्हारी सादगी और सच्चाई से बहुत प्रभावित हुआ हूं। ….मुझे तुम्हारे व्यक्तित्व में वे सारे गुण दिखाई दे रहे हैं, जो एक पत्नी में होने चाहिये। सब से बड़ी बात यह है कि तुम टेलेंटेड़ हो और मुझे व्यवसाय चलाने में भी सहयोग दे सकती हो। ”
उनकी बात ने मनीषा की झिझक को कुछ हद तक कम कर दिया। ‘ परन्तु सर, मेरे माता-पिता इसे स्वीकार नहीं करेंगे, तो ?’
‘ पहले मैं तुम्हारी मन:स्थिति समझना चाहता हूं…..माता-पिता की राय बाद में जानना जरुरी रहेगा। ….. हॉं, एक बात और है- हमारे बीच दस बारह साल का अंतर होगा, जो तुम्हें स्वीकार होगा या नहीें, यह बात मैं नहीं कह सकता। दूसरी बात मैं और स्पष्ट करना ठीक समझ रहा हूं-हमारा विवाह सादगी से होगा….. रस्म रिवाज नहीं होंगे। अर्थात न बाजे बजेंगे और न ही बारात जायेगी। वैवाहिक भौज नहीं होगा। शादी कोर्ट में होगी और तुम्हारे माता-पिता की उपस्थिति में होगी। ”
प्रत्युत्तर में मनीषा का उत्तर बहुत स्पष्ट और सधा हुआ था, ‘ आप देवपुरुष है….यही मेरे लिए सबकुछ है। दोनो के बीच आयु का अंतर का मेरे लिए कोई मायना नहीं रखता।….मैं आपकी सादगी से सहमत हूं., परन्तु………..’
‘ और किन्तु-परन्तु क्या रह गया है- वह भी स्पष्ट कर दो ?’
उसने संकोच से कहा, ‘ आपका प्रस्ताव सुनते ही मैं हक्का-बक्का गई.। मैं अननिर्णय की स्थिति में थी, इसलिए बहुत कुछ बोल गई., जो मुझे नहीं बोलना चाहिये…….क्या मुझे आप थोड़ा वक्त और विचार करने के लिए देंगे ?’
‘मैं तुमसे अभी और इसी वक्त शादी नहीं कर रहा हूं और न ही तुम्हें भगा कर ले जा रहा हूं।……तुम आराम से सोच विचार कर लो, मुझे कोई जल्दी नहीं है। …..तुम मुझे ठुकरा दोगी तो भी किसी अन्य से विवाह नहीं करुंगा। …….हॉं, एक और अनुरोध है मेरा- हमारे बीच जो भी बात-चित हुई. है, हमारे बीच ही सीमित रहनी चाहिये। इसकी जरा सी भनक किसी को हो गई., तो बतंगड़ हो जायेगा। ”
प्रत्युत्तर में वह मुस्करा दी। पहले आंसू ढुलक रहे थे। अब मुस्काराहट बिखर रही थी। चेहरे पर तनाव की जगह निर्मल शांति थी। उसकी स्थिति उस विजेता की तरह हो गई थी, जो हाथ में पुरुष्कार थामें प्रसन्न हो कर मंच से उतर रहा है। मनीषा ने उठते ही सर का हाथ पकड़ लिया और अधिकार से उनकी ओर देखने लगी। उसकी आंखें कह रही थी- ‘आप मुझे स्वीकार्य हैं। भला ऐसी हस्ती को कौन मूर्ख ठुकरा सकता है। ईश्वर ने अनजाने में ही आज उसकी झोली में ऐसा सुख उड़ेल दिया था, जिसकी स्वपन में भी उसने कभी कल्पना नहीं की थी।’
आज उसकी आंखों में नींद नहीं थी। रह रह कर उसके कानों में वे वाक्य घंटिया बजा रहे थे, जो उसकी किस्मत बदल रहे थे। जिस कम्पनी में वह मामूली नौकर थी, उसका मालिक बनने का ऑफर उसके पास था। एक रंगीन दुनिया में प्रवेश का द्वार खुल रहा था, जो उसकी नीरस जिंदगी की फिज़ा बदल देगा। क्या सचमुच ऐसा सम्भव है ? उसने अपने आप से प्रश्न किया। ….. यदि यह सम्भव भी नहीं हुआ तो उसको दिया गया प्रस्ताव ही उसके लिए स्वर्गिक आनन्द की अनुभूति है। वह उठी। उसने अपने आपको आईने में निहारा। शायद पहली बार वह स्वंय अपनी सुन्दरता पर मुग्ध हो गई। उसके भीतर बैठी वह नारी जाग गई, जिसने उसे सुला रखा था। उसके घर की जो परिस्थितियां थी, उसे देख कर उसने ऐसा सपना देखना भी पाप समझा था। पर अब वह अधिकार से उनके कमरे में जा कर बात कर सकती थी। वह साहब से आज खुल कर और दिल खोल कर बातें करना चाहती थीं। साहब के कमरे के बाहर आ कर उसने बिना संकोच और झिझक से घंटी बजा दी। ऐसा करना कल तक उसके लिए लगभग असम्भव था, क्योंकि उनके बीच एक दीवार बनी हुई थी, जिसे लांघा नहीं जा सकता था, किन्तु वह दीवार आज गिर गई थी।



‘ कम इन।’ भीतर से आवाज़ आई। कमरा खुला था। वह आहिस्ता से भीतर आ कर एक ओर खड़ी हो गई। ‘ आपसे कुछ बात करनी थी, उसने तनिक संकोच के साथ यह बात कही। ‘आओ, बैठो।’ उन्होंने सामने रखी कुर्सी पर बैठने के लिए इशारा किया। वह कुर्सी पर बैठ गई। साहब ड्रींक ले रहे थे, इसलिए वह थोड़ी असहज हो गई। वे एक टक शराब की बोतल की ओर देखे जा रही थी। ‘ शायद तुम शराब से नफरत करती हो ? ‘ नहीं, सर, ऐसा कुछ नहीं है…..मैं कल बात करुंगी।’ वह उठी और कमरे से बाहर जाने लगी।
‘बैठो, उन्होने विनम्रता से कहा, ‘ मैं पीयक्कड़ नहीं हूं। सोने से पहले थोड़ी बहुत लेता हूं। तुम्हें डरने की कोई बात नहीं है- बेफिक्र हो कर अपनी बात कह सकती हो। ‘
साहब, मैं, कहना चाहती हूं कि……….’ वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाई और ध्यान से उनके चेहरे के मनोभाव पढ़ने लगी।
एक बात कहूं- बुरा तो नहीं मानोगी ?’ उसने जब अस्वीकृति में सिर हिला दिया तो वे धीमे से बोले, ‘ एक घूंट पीलो-तुम्हारी झेंप मिट जायेगी-सारी अंदर की बातें बाहर आ जायेगी। ‘
‘ नहीं, सर, ऐसी कोई बात नहीं है। ‘ कह कर वह उठने लगी तो उन्होंने हाथ पकड़ कर बिठा दिया। खाली गिलास में थोड़ी शराब उड़ेली और उसके होंठों पर लगाते हुए बोले, ‘ थोड़ी ले लो…. मेरे साथ रहोगी तो इसकी आदत डालनी होगी।’
वह उनकी बात नहीं टाल पाई। एक घूंट भरा। उसे अजीब सा लगा। उसने हाथ से ‘नही’ का इशारा किया, पर दूसरे ही क्षण उन्होंने पुन आग्रह कर उसके होंठो पर गिलास लगा दिया। उसने गिलास हाथ से पकड़ लिया और धीरे-धीरे पीने लगी। अब उसका संकोच मिट गया था। उसने अपने हाथ से थोड़ी शराब और गिलास में उडेली और पीने लगी। उसे नशा आ गया था। उसके भीतर बैठी हुई औरत पूर्णतया उन्मुक्त हो गई। संकोच और लज्जा पूरी तरह विलुप्त हो गई। वह उठ कर उनके पास बैठ गई और एक टक उनकी और देखने लगी। फिर न जाने क्या सोच कर उनके गालों पर चुम्बनों की बौछार कर दी। गिलास में बची हुई शराब घटक गई। सोफे से नीचे उतर कर उनके कदमों में बैठ गई। कुछ देर यूं ही बैठी रही, फिर बोली, ‘ सर, आप मुझें सचमुच प्यार करते हैं ?….. कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुझ गरीब को एक दिन मझधार में छोड़ देंगे ? ….. मुझे बचपन से किसी का प्यार नहीं मिला।…… मां-बाप के स्नेह के लिए मैं तरसती रही। जब से होंश सम्भाला है-मुझे जीवन में तिरस्कार और उपेक्षा के अलावा कुछ नहीं मिला।’ उसकी आवाज़ भर्रा गई। वह फफक कर रोने लगी। उनके पांव पकड़ कर रोते हुए अनुनय विनय करने लगी, ‘ आप मुझे धोका तो नहीं देंगे सर ?….. मेरे शरीर का उपयोग कर मुझे छोड़ तो नहीं देंगे ?”
उन्होंने हाथ पकड़ कर उसे पुन: सोफे पर अपने पास बिठा दिया। वह उनकी गोद में सर रख कर रोने लगी। उसके बालों को सहलाते हुए वे बोले ‘ तुम हू- ब-हू तो नहीं, परन्तु कुछ-कुछ मेरी दिवंगत पत्नी जैसी दिखती हो। तुम्हारी बात करने की स्टाईल, चाल-ढाल, चेहरे की मासूमियत मुझे सहसा अपनी पत्नी की याद दिला देती है, इसलिए जब तुम्हे पहली बार देखा, मुझे तुम पसंद आ गई, क्योंकि तुम्हारे भीतर मुझे अपनी पत्नी की छवि दिखाई दी थी। यद्यपि तुम अपनी मेहनत और लगन से आगे बढ़ी हो, किन्तु मेरे विशेष स्टाफ में सम्मिलित किया जाना, मात्र संयोग नहीं, यह मेरा निर्णय था।
कहते-कहते वे थोड़ी देर के लिए रुके, फिर बोले, ‘ तुम्हारे भीतर जो गुब्बार भरा था, वह फूट गया।…..तुमने मुझे वह सब कुछ कह दिया, जो कहने में संकोच कर रही थी।…..अब तुम अपने कमरे में जाओ और सो जाओ। ”
वह अन्यमन्यस्क भाव से उठी। वे भी उसके साथ खड़े हो गये और दोनो एक साथ बाहर आ गये। उसके कमरे तक आने के बाद उन्होंने कहा, ‘ कमरा अंदर से बंद कर सो जाओ।…… गुड नाइट! ‘ कहते हुए वे पुन: अपने कमरे में आ गये। सुबह जैसे ही उसकी आंख खुली- रात के घटनाक्रम के बारें में सोचने लगी। उसे कुछ कुछ याद आ रहा था, पर यह नहीं समझ पाई कि वह कमरे में कब आई। खैर, आज उसका रोम-रोम पुलकित था। सौम्य, किन्तु सदा उदास रहने वाले चेहरे पर प्रफुल्लता झलक रही थी। जब उसने आईने में अपने आपको देखा तो स्वंय ही अपने बदले रुप को देख कर आश्चर्य चकित रह गई। प्रसन्नता और खुशी की अलग ही आभा चेहरे पर दिखार्इ देती है। उसकी बड़ी बड़ी आंखे भीतर के उल्लास से चमक रही थी।
कम्पनी स्टाफ और वेन्डर्स के बीच हुई मीटिंग में उसके व्यक्तित्व की अलग ही छटा बिखरी हुई थी। सदा उदास और गम्भीर रहने वाली लड़की जो मीटिंग में नपे तुले शब्दों में अपनी बात रखती थी, आज चहक रही थी। उसकी बोलती आंखों ने सभी को मोहित कर दिया। मीटिंग का बोझिल वातावरण उसकी निश्छल हंसी से गुलज़ार हो उठा था। वह आज ऐसे कामेंटस कर रही थी, जिससे कई बार मीटिंग हॉल में हंसी के ठहाके गूंज उठे थे। मीटिंग की समाप्ति पर एक सदस्य ने कह ही दिया था, मैड़म ! आपका व्यक्तित्व इतना आकर्षक और मोहक है, यह आज हमे मालूम पड़ा। वह प्रत्युत्तर में केवल आंखों से मुस्करा दी। परन्तु मीटिंग के दौरान और बाहर निकलते समय साहब ने अपने चेहरे पर गम्भीरता ओढ़ रखी थी, वे अपने स्टेटस को देखते हुए जानबूझ कर मौन रहना चाहते थे।
‘ आज रात की फ्लाइट से हम बम्बर्इ लौट रहे है, तुम चाहो तो आज मार्केटिंग कर सकती हो ‘ कह कर उन्होनें अपना क्रेडिट कार्ड आहिस्ता से उसे थमा दिया और आगे बढ़ गये। वह नि:शब्द रही। कार्ड लिया और चुप- चाप गर्दन झुकाये पीछे-पीछे चलने लगी। जब उसने देखा कि आस-पास कोई नहीं है, वह धीरे सर फुसफुसाई, ‘ सर लिमिट ? ‘ कोई लिमिट नहीं। ‘ कह कर वे तेज कदमों से आगे बढ़ गये। उनका उत्तर सुन कर वह उछलने लगी। उसका मन मयूर नाचने लगा। वह शॉपिंग करने गई। जम कर शॉपिंग की। उन सभी चीजो को खरीदा, जिसे वह हसरत भरी नज़रों से देखती थी, परन्तु कभी छूने का साहस नहीं कर पाई थी। घर की जिम्मेदारियों ने उसे बांध रखा था। लाख कोशिश करने के बाद भी हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे थे। पिता और उसकी आय जोड़ने के बाद भी घर खर्च मुश्किल से चल पाता था।
कोई दस दिन बाद वह एक बड़ासा सूट केस ले कर घर लौटी। उसका हुलिया पूरी तरह बदल गया था। चेहरे पर उदासी की जगह खुशी छलक रही थी। उसने नये फेशनेबल कपड़े पहन रखे थे। घर के सदस्य अचम्भित हो कर उसे देखने लगे। छोटे भाई से रहा नहीं गया, उसके बदले रुप को देख कर मुस्कराते हुए बोल ही उठा, ‘ क्या बात है दीदी, बहुत बदल गई हो….क्या सारी परेशानियों को यमुनाजी में डूबो कर आई हो ?’
‘ नहीं रे, चींटू…… अब बड़े बड़े लोगों के साथ उठना बैठना पड़ता है, थोड़ा तो अपने आपको बदलना ही पड़ेगा। ” वह चेहरे पर हंसी बिखेरते हुए घर के अंदर प्रविष्ट हुई।
उसके बदले रुप को देख कर पिताजी का माथा ठनका। वे सोचने लगे-कहीं यह लड़की सारी कमाई यूं ही उड़ा देगी, तो घर कैसे चलेगा। मां सोचने लगी- उसकी खूबसूरती और अच्छी नौकरी को देख कर कई रिश्ते आ रहे हैं। कोई न कोई बहाना बना कर सभी को मना कर रहे हैं, परन्तु अब इसके बदले हुए रुप को देख कर तो रिश्तों की बाढ़ आ जायेगी।…..तीन बच्चों की पढ़ाई लिखाई…. लड़कियों की शादी सभी तो अभी बाकी है और इनका रिटायरमेंट भी तो नज़दीक है। फिर वह मन ही मन प्रार्थना करने लगी…….भगवान ! कम से कम पांच साल इसकी शादी टल जाय तो…………’उसके भीतर से ही आवाज़ आई- यह कैसे सम्भव होगा….. इसकी छोटी बहनो की शादी हो जायेगी और यह कुंवारी बैठी रहेगी ?’ इस प्रश्न का उसके पास उत्तर नहीं था।



उनके पास रहने के लिए दस बाई पंद्रह फिट का एक कमरा था, जिससे जुड़ा हुआ एक छोटा सा कीचन और स्टोर था। पिताजी और भाई बाहर बरामदे में सोते थे, चारों बहने, मां और वह कमरे में एक ही लाईन में बिस्तर बिछा कर सोते थे। अब तक उसकी जिंदगी अच्छी कट रही थीं, परन्तु आज उसे अपनी गरीबी अखर रही थीं। उसकी आंखों में नींद नहीं थीं। बैचेनी से करवटे बदलते हुए सोच रही थीं- उसके मां-बाप कभी उसकी शादी के लिए राजी नहीं होंगे। आधी उम्र होने तक भी वह अपने उतरदायित्व से मुक्त नहीं होगी।……उम्र निकल जाने के बाद कौन उससे शादी करेगा ?. परन्तु …मैं क्यों अपने मां बाप की गलती की सजा भुगतू ? आखिर इन्होंने मुझें दिया ही क्या है ? यह तो इनका दुर्भाग्य था जो मुझे संसार में ले आये, फिर क्यों मुझे अपना सौभाग्य मानने लगें हैं। नहीं….! जीवन में आया एक स्वर्णिम अवसर, जो मेरी तकदीर बदल देगा, मैं ऐसे अवसर को क्यों छोड़ूं ? ….. आखिर मेरी अपनी जिंदगी है। बचपन रोते-रोते बीता और इसी तरह कमज़ोर और दबी हुई रही तो जवानी भी परिवार का बोझ ढोते-ढोते बीत जायेगी। मस्तिष्क में विचारों तीव्र उबाल उबलता रहा। उसे देर रात तक नींद नहीं आई। सुबह देर तक सो रहीं। मां ने उसे झकझोर कर उठाया, तब उसकी नींद टूटी।
ऑफिस में आ कर बड़ी ही तन्मयता से अपना काम करने लगी। उसके बिंदास रुप को देख कर सभी अचम्भित थे, किन्तु उनके द्वारा दागे गये सवालों का जवाब वह सिर्फ मुस्ककरा कर दे रही थी। उसकी उदासी चेहरे से गायब थी। उसका पहनावा और बालों की स्टाइल बदल गई थी। उसने ऑफिस आने के पहले कभी मेकअप नहीं किया था, पर आज वह हल्का से मेकअप कर के आई थीं। वह एक लुभावने और आकर्षक व्यक्तित्व की धनी थीं, जिसे उसने जानबूझ कर अपनी उदासी के आवरण से ढंक रखा था। साहब से उसकी सुबह ही मुलाकात हुई थी। सिर्फ औपचारिक गुड मार्निग हुई थी। सदा की तरह उन्होंने गर्दन झुकाये उन्होंने मार्निंग कहा था। दिन भर वह उनके केबिन में जाने का बहाना तलाशती रही, पर ऐसा कोई बहाना था ही नहीं। उन्होंने भी उसे नहीं बुलाया। वह जानती थी, सर कोई मजनू तो है नहीं, जो अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकते।
शाम को सात बजे बाद जब सभी लोग जा चुके थे, उसे साहब ने अपने केबिन में बुलाया। उनकी टेबल के सामने वह सिर झुकाये खड़ी रही। जब उन्होंने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया तब वह बैठी। उसे एक टक देखने का बाद वे बोले, ‘ तुम्हारे बदले रुप ने मुझे भी अचम्भित कर दिया।…..वास्तव में कुदरत तुम पर मेहरबान है….तुम बहुत सुन्दर हो, मनीषा !………हमे कोर्ट ने अगले महीने की बीस तारीख दी है…. तुम चाहो तो अपने माता-पिता को हमारी शादी की सूचना दे सकती हो। ”
‘ नहीं, सर। में अपने परिवार को शादी की सूचना नहीं दूंगी, क्योंकि मैं उनके लिए दुधारु गाय हूं और वे मुझे किसी ओर को सौंपना नहीं चाहेंगे। बीस तारीख तक हमारी बात गोपनीय रहेगी। मैं उसी दिन उनको कोर्ट में बुलाऊंगी और उन्हें अपने गवाहों के रुप में पेश करुंगी।’ कुछ देर तक मौन रहने के बाद बोली, ‘ सर मैं उस रात बहक गई थी…..मैंने क्या कहा और क्या हरकत की, मुझे क्या याद नहीं….क्या आप मेरी नादानी के लिए मुझे माफ कर देंगे ?’
उसकी बात सुन वे जोर से हंस पड़े, ‘ तुम शराब नहीं चखती तो तुम्हारे भीतर के उदगार बाहर कैसे आते ? खैर, अब देर बहुत हो गई है, अपनी बस पकड़ो…. हॉं, छूट जाय तो मुझे काल करना। ‘ उसे अहसास हो गया कि अब ऐसी ही संक्षिप्त मुलाकाते होगी। नपे तुले शब्दों में बातें होगी। वह समझ गर्ह कि उसे न तो बिना किसी काम के उनके ऑफिस में आना है ओर न ही यहां ज्यादा देर तक बैठना है। वह उठी और मोहक मुस्कान बिखेरती हुई बाहर हो गई ।
अगले महीने की बीस तारीख भी आ गई । इस तारीख के पहले के दिन उसे बहुत बोझिल लगे थे। उसे रह रह कर यह आशंका हो रही थी कि पता नहीं कब क्या हो जाय और उसकी सारी आशाओं पर तुषारापात हो जाय। इसी चिंता में उसे रात देर तक नींद नहीं आई थी। सुबह उसकी नींद समय पर नहीं खुली थी। मां ने उसे कई बार जगाया था और ऑफिस पहुंचने में देरी होने की चेतावनी दी, पर वह नींद में ही कह रही थी- ‘ मां, मैं आज ऑफिस नहीं जाऊंगी।’ मां उसके बदले बदले रंग ढंग को समझ नहीं पाई । आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ जब वह समय पर उठ कर ऑफिस जाने के लिए तैयार नहीं हुई थी।
वह आठ बजे उठी। उठते ही आंखें बंद कर भगवान से प्रार्थना करने लगी- ‘है, प्रभु,, मुझे शक्ति देना ताकि आज का दिन मेरे लिए सब से सुखद दिन बन जाय, जिसे मैं ता उम्र भूल नहीं पाऊं ! मॉं उसके बदले रुप को एकटक देखे जा रही थी और पिता उसे देख कर चिंतित हो रहे थे। …..उनकी मनीषा अब पहले जैसी सीधी सादी लड़की नहीं रही। जो लड़की इतनी मितव्ययी थी कि अपने शरीर के ऊपर एक रुपया खर्च करने के पहले दस बार सोचती थी, वह हज़ारो रुपये के कपड़े ले आई। …..इस लड़की का यही हाल रहा तो घर की हालत बिगड़ जायेगी। …….आखिर इसके इतने पंख क्यों लग गये हैं ? कहीं यह……..नहीं ऐसा नहीं हो सकता…. मैं ऐसा होने ही नहीं दूंगा। पिता देर तक इसी द्वंद्व में डूबे रहे।
आज उसने नई साड़ी पहनी। महंगी साड़ी वह दिल्ली से खरीद कर लाई थी। भारी भरकम मेकअप कर जब वह तैयार हुई तो मां से रहा नहीं गया, आखिर पूछ ही बैठी- ‘आज तुम बन- ठन कर कहां जा रही हो ?’ उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ मैंने ऑफिस से आज छुट्टी ली है…मैं एक शादी की पार्टी में जा रही हूं। आप लोगों को भी वहां आना होगा। मैं वहां जा कर आपाको फोन कर दूंगी। ‘ बात उसने बहुत धीमे स्वर में काफी नपे तुले शब्दों में कही थी। जब तक काम नहीं बन जाय संशय बनाये रखना उसके लिए जरुरी था।



माता-पिता के विस्मय का ठीकाना नहीं रहा, जब उनके घर के बाहर टेक्सी आ कर रुकी। मनीषा बस से ही ऑफिस जाती थी। बस छूट जाती तो ऑटो कर लेती, पर अब टेक्सी ? ….. वे कुछ समय नहीं पाये। एक अजीब सी आशंका से वे अपनी बेटी को टेक्सी में बैठते और जाते देखते रहे। उन्हें समझ आ गया कि बेटी अब उनके हाथ से जा रही है। उनके दिन फिरने वाले हैं। इस लड़की से थोड़ी बहुत आशा थी वह भी आज समाप्त हो गई।
लगभग घंटे भर बाद मनीषा का फोन आया कि वह टेक्सी भेज रही है, आप आ जाओ। कुछ पूछने के बजाय उन्होंनें टेक्सी में बैठना ही उचित समझा। टेक्सी कोर्ट परिसर में आ कर रुक गई। मनीषा कई लोगों के बीच खड़ी थी। उन्हें टेक्सी से उतरते देख वह उनके पास आ गई और थोड़े संकोच से बोली-’ मैं आपको बताये बिना ही शादी कर रही हूं।…..आपको मैंने अपने गवाहों के रुप में बुलाया है।’
उसकी इस बात पर दोनो सन्न रह गये। उनकी धमनियों में बहता खून ठंडा पड़ गया। उन्हें लगा जैसे उनकी बेटी ने अचानक धक्का दे कर किसी गहरे समुंद्र में धकेल दिया है। वे कुछ बोले उसके पहले ही वह पलट गई। तेज कदमों से चलती मजिस्ट्रेट के कमरे में दाखिल हुई। वे बिना कुछ कहे उसके पीछे-पीछे आ गये। अंदर आ कर वह बोली- ‘ सर, ये मेरे माता-पिता है।… मेरे गवाह।’ उनकी तरफ एक रजिस्टर आगे कर दिया था। उन्हें पेन दिया और हस्ताक्षर करने का आग्रह किया। क्रोध से तमतमाये पिता ने उस रजिस्टर में हस्ताक्षर कर दिये। मां ने भी उनका अनुसरण किया। मां यकायक रुंआसी हो गई। उसने अपने आंचल से रुलाई रोकने की कोशिश की और बाहर आ गई। ‘ यह लड़की इतनी बदमाश निकलेगी, हमने सपने में भी नहीं सोचा था,” पिता क्रोध से बेकाबू हो कर बोले, पर अब वे कर ही क्या सकते हैं, जब सब खेल खत्म हो गया हो। यह तो गनीमत रही कि उन्हें बुला कर इस खेल में शामिल कर दिया, अन्यथा वे इस पूरे नाटक से अनजान ही रहते।
मनीषा आदमियों के झुंड़ के साथ बाहर निकली। उसके साथ जो आदमी माला पहने चल रहा था, उसे देख कर वे चकित रह गये।….यह तो मनीषा के कम्पनी का मालिक है।…..इतना बड़ा आदमी उनका जमाई बन गया ! है, भगवान ! हम यह क्या देख रहे हैं ! वे दोनो सहमे सहमे से खड़े रह गये। दोनों ने आ कर उनके पेर छुए। उनकी वैधानिक शादी हो गई थी- आर्श्रीवाद देने के अलावा उनके पास कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
‘ ये मदन मल्होत्रा है, हमारी कम्पनी के मालिक।’ उसने झेंपते हुए माता-पिता से उनका परिचय करवाया। वे दोनो अपनी बेटी और जवांई को इस तरह देखने लगे जैसे कोई सपना देख रहे हों। जब आस पास की भीड़ छंट गई, तब एक आदमी ने आ कर उन्हें एक चेक थमाया, जिसमें पच्चीस लाख की राशि लिखी हुई थी। चेक लेते हुए उनके हाथ कांपने लगे। ‘ रख लीजिये, आपकी बेटी अब पराई हो गई है… वह आपको मदद नहीं कर पायेगी। उन्होंने डबडबाई आंखों से उस आदमी की ओर देखा, जो उसकी सम्पति लूट कर ले जा रहा था और बदले उसकी कीमत अदा कर रहा था।
‘ मां मुझे माफ करना’, कहते हुए वह मां से लिपट कर सुबकने लगी। आपके लिए मैं अभिशाप थी…. आज मैं आपको उस अभिशाप से मुक्त कर रही हूं।….दुनियां के हर मां-बाप अपनी बेटी को सुखी देखना चाहते हैं।…..मेरे सुख से आप खुश होंगे और मेरी पहाड़ सी गलती को माफ कर देंगे। ”
‘ क्या बकवास कर रही हो बेटी, पिता ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘ तू अभिशाप कहां है….. ऐसी भाग्यशाली बेटी किसके लिए अभिशाप होती है। “…. यकायक उनकी स्मृति पटल पर वह दृश्य उभरा, जब उसके जन्म का समाचार आया था और वे दीवार से सर फोड़ने लगे थे। तब वे रह रह कर भगवान को कोसते हुए कह रहे थे- ‘ मेरा ऐसा भाग्य क्यों लिखा भगवान ?’ पर अब उनकी वही बेटी पलक झपकते ही करोड़ो की नही, अरबों की मालकिन बन गई है।
एक बड़ी सी कार उनके पास आ कर रुकी। उसने एक बार पुन: अपने मां-बाप के पांव छुए और कार में बैठ गई। कार स्टार्ट हुई। उसने हाथ हिला कर विदा ली। कार ने गति पकड़ी ली। थोड़ी देर में वह आंखों से ओझल हो गई। ‘ मोहीनी, हमारी प्यारी चि​िड़या फुर्र से उड़ गई और हम देखते ही रह गये। ‘ मां ने भर्रायी आवाज में कहा, ‘ हमने अपनी बिटियों को बहुत दुख दिये हैं……हम पापी हैं ! ” पश्चाताप में उन दोनो की आंखों से आंसू बहने लगे।
जब मनीषा का जन्म हुआ था, तब लोगों ने कहा था, ‘ कितनी सुंदर बच्ची है’, पर मोहीनी ने अपनी बेटी की ओर देखा तक नहीं था। वह रोती थी, तब भी वह उसे दूध नहीं पिलाती। जब वह पति को कुढ़ते हुए देखती थी, तब उसका मन करता- इसका गला दबा कर मार दूं, पर इतना साहस नहीं कर पाई। जब थोड़ी बड़ी हुई और अपनी बड़ी बड़ी आंखों से उसे मुस्कराते हुए टुकर टुकर देखती, तब भी वह नफरत से मुंह फेर लेती। ऐसा इसलिए था, क्योंकि पुत्र की चाह में उन्होंनें तीसरी संतान पैदा की थीं। तब वह सोचती -लड़का चाहे काला कलूटा और बदसूरत हो तब भी वह बेटा कहलाता है…. पर बेटी लाख हीरा हो, तब भी वह अपनी कहां रहती है। परन्तु जब मनीषा पढ़ने में हमेशा अव्वल आती, तब उसे महसूस हुआ कि बेटियों सें इतनी नफरत भी ठीक नहीं है। किन्तु जब मनीषा को अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी मिली, तब उसे समझ आया – बेटियां, बेटों से किसी तरह कम नहीं होती। परन्तु आज की घटना ने साबित कर दिया कि बेटियां आपके दुर्भाग्य को भी सौभाग्य में बदल देती है। ईश्वर प्रत्येक जीव के साथ उसका अपना भाग्य भी नत्थी करके भेजता है।

स्वरचित मौलिक रचना
Ganesh Purohit

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