आत्मसम्मान, एक युद्ध औरत के लिए (भाग – 2 ) – स्मिता सिंह चौहान

सुबह दरवाजे को बन्द करने की जोर की आवाज से सिया की आंख खुली ।घड़ी में टाइम देखा तो वो आफिस के टाइम से काफी लेट हो चुकी थी।फोन पर कुछ मैसेज टाइप करके ,वो टेबल पर फोन रखती हैं ।तभी उसकी नजर एक फोटों पर पढती है, जहां नीरज और वो कितने खुश नजर आ रहे थे।वो अतीत के उस मोड़ पर मुड़ गयी जहां उन दोनों ने अपनी गृहस्थी की शुरुआत की थी ।कितने खुश थे वो ।

समय बीतने के साथ नीरज की सपनों की दुनिया सर उठाने लगी ।जिस दुनिया में बंगला, गाडी, पैसा ही जीवन की बेहतरीन परिभाषा थी ।सिया ने नीरज के कहने पर जाॅब करनी शुरू कर दी ,ताकि नीरज के सपने जल्द से जल्द पुरे हो ,और वो दोनो एक खुशहाल जीवन जी सके ।लेकिन सिया को नहीं पता था कि उस का सफर उसे आगे चलकर तकलीफ के सिवा कुछ नहीं देगा ।

पीहू के जन्म के बाद वो जाॅब छोडना चाहती थी लेकिन तब नीरज ने उसे पीहू के लिए एक सुरक्षित भविष्य देने का वास्ता देकर मना लिया ।सिया फिर एक बार नीरज की बातों में आ गयी ।पीहू के शुभ कदमों, और सिया की मेहनत रंग दिखाने लगी।उसको प्रमोशन के साथ एक अच्छा औहदा मिला ।कहते हैं ना बड़ा औहदा ,बड़ी जिममेदारी भी लेकर आते हैं ।सिया की घर पर पीहू की जिममेदारी के साथ साथ आफिस की जिममेदारीया भी बढती जा रही थी ।पीहू के लिए तो उसने एक मेड रख ली थी।नीरज को सिया का नौकरी करना तो नहीं अखरता था,लेकिन वो अपनी पुरूष प्रधान समाज की दोहरी मानसिकता से ग्रसित था ।जिस दिन वो जल्दी घर पहुँच जाता ,उस दिन क्लेश होना जैसे एक नार्मल बात थी ।उस पर उसको लगता था कि आफिस में औरतों को हर आदमी गलत नजर से देखता है, और औरतों को इतनी समझ नहीं होती कि वो उनकी नजर समझ पाये ।बस उसकी यही सोच उसे शक के गर्त में धकेलती जा रही थी ।सिया सोचती थी कि नीरज जाॅब करता है इसलिए वो सिया की सिथतियो को बेहतर समझ पायेगा ।लेकिन वो नहीं जानती थी कि नीरज का दोहरा मापदंड अपने पुरुषत्व के अधीन होकर  एक दिन उसका आत्म सम्मान कुचल देगा ।

अचानक दरवाजे की घंटी बजी ,सिया अपनी तंद्रा से जग गयी ।”हाय ,सुप्रिया आने के लिए ।थैंकस यार मेरे एक मैसैज  पर आने के लिये ।”

 

“तुम भी ना सिया ,बहुत फार्मल हो जाती हो कभी कभी ।कभी कभी तो मुझे भी शक होने लगता है हम दोस्त भी हैं या नहीं ।”सुप्रिया बोली हसकर बोली ।

 

“आज मैंने तुमसे  दोस्त की तरह नहीं, एक वकील की तरह सलाह लेनी थी ।एक बार सोचा ऑफिस आऊ लेकिन शरीर आज साथ नहीं दे रहा था ।सोचा घर पर खुलकर बात भी हो जायेगी।”सिया बोली ।


 

“फिर कुछ हुआ नीरज के साथ ।चलो छोड़ो …ये सब का कोई फायदा नहीं है ।ये बताओ क्या सोच रही हो?”सुप्रिया ने सिया का हाथ पकड़ा ।

 

सिया के आखों में आंसू आ गये “यार ,बहुत सोचा अब नहीं ।कल रात नीरज ने मेरे सहयोग को जिस तरह परिभाषित किया ।मेरा अस्तित्व हिल गया ,मैं सोचती थी कि वक्त के साथ सब ठीक हो जायेगा ।लेकिन जानती हूँ मैने निर्णय लेने में देर कर दी ,14 साल की गृहस्थी को तोड़ना आसान नहीं है मेंरे लिये ।तू जानती है नीरज मेरे लिये क्या है?लेकिन कभी कभी किसी को हद से ज्यादा चाहने की कीमत प्यार करने वाले को ही देनी पड़ती है ।अगर आज मै ये नहीं कर पायी तो कभी नहीं कर पाऊँगी ।मुझे तलाक चाहिए ।”सिया फफक के रोने लगी ।

 

“मुझे पता है, तू नीरज को कितना प्यार करती हैं ।उसका ही तो फायदा उठाता आया है वो ,तू एक बार और सोच ले।एक बार इस रास्ते पर आगे बढ गयी तो चाहकर भी पीछे नहीं हट पायेगी।”सुप्रिया ने उसे रोते हुए देखकर संभालने की कोशिश की ।

“नहीं सुप्रिया, कल के बाद वो मेरे मन से निकल गया ।इन आंसुओ पर मत जा ये तो हमारे 14साल के सफर के जुडाव को धोने आये हैं ।मेरी पीहू 12 साल की है,कल के दिन वो भी कभी ना कभी अपने सपनों की उडान भरेगी ।तो तू बता क्या ऐसा बाप जिस की सोच औरत के लिये दोहरी हो ।जिसकी नजर में किसी भी औरत के सफल होने का मापदंड उसकी मेहनत नहीं, उसका जिस्म हो ,वो क्या अपनी बेटी के सपनों की इज्जत कर पायेगा ? नहीं यार मैं पीहू को इस सिचुएशन में नहीं डाल सकती ।वो तो कम से कम अपनी जिंदगी किसी की शर्तो, सवालों के अधीन होकर ना जीये।मुझे इस आदमी से कुछ नहीं चाहिए, मैं खुद सक्षम हूँ, जब मैं उसकी जिंदगी को उसके सपनों के रंगों से भर सकती हूँ तो अपनी क्यो नहीं?बस मैं अब और नही रह सकती ।”सिया ने अपने मन का मलाल सुप्रिया के आगे रख दिया।

 

“ठीक है ।जब तूने सोच ही लिया है, मैं कागज तैयार करके शाम तक भिजवाती हूँ ।जब तू खुद तलाक बिना किसी एलीमनी के मांग रही है, तो इसमें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा ।अभी भी सोच ले क्या वाकई कुछ नहीं चाहिए?”सुप्रिया ने फिर से एक बार सिया का मन कुरेदा ।

 

“नहीं यार कुछ नहीं चाहिए, इस आदमी से मेरी और पीहू की आजादी के सिवा ।भावनाओं की कोई कीमत नहीं होती ,और आत्म सम्मान की तो बिलकुल भी नहीं ।ऐसे आदमी के दिये पैसों पर नहीं जी सकती जो 14 साल ना अपनी बीवी को सममान दे पाया ,ना अपने बच्चे की माँ को।”सिया ने भावावेश में बोली ।

“ठीक है।तुम अपना ध्यान रखो ।मैं अभी चलती हूँ ।”सुप्रिया सिया के अगले सफर को अंजाम देने चल पडीं ।

 


सिया ने सुप्रिया के जाने के बाद पीहू को फोन किया और उसे अपने निर्णय के बारे में बताया ।पीहू भी सिया के साथ थी ,कयोंकि उसने भी अपनी छुट्टियों में बहुत कुछ देखा था,और कहते हैं ना लडकिया कम उम्र में ही ज्यादा समझदार हो जाती है ।

 

शाम को नीरज घर पहुंचा, तो डायनिग टेबल पर पडें हुए कागजो को देखकर हतपृरभ रह गया ।”सिया ,सिया …..ये क्या पागलपन है?”नीरज बोल ही रहा था कि सिया अपना सामान हाथ में लिये कमरे से बाहर आते हुए दिखी ।

 

“ये सब क्या है?ठीक है सारी यार ।गुस्से में निकल जाता है मुँह से ।और हमारे बीच तो ये सब चलता रहता है ।ठीक है, अब मैं अपने पर काबू रखूंगा।बताओ तुमहे क्या चाहिए?”नीरज अचानक डिवोर्स पेपर देखकर बौखलाते हुए बोला ।

 

“शायद तुमने ठीक से पढा नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस तुमसे आजादी चाहिए ।मैं अपने आत्मसम्मान को तुम जैसे आदमी के लिए कुर्बान नही कर सकती”सिया ने पूरे आत्म विश्वास से बोला ।

 

“देखो सिया ,पीहू का सोचो।इससे तुम क्या पाओगी?क्यो पागलपन में निर्णय ले रही हो।”नीरज ने उसे फिर से रोकने की कोशिश की ।

 

“पीहू का ही तो सोच रही हूँ, नीरज।मुझे रोकने की कोशिश मत करो ।मैं मन से इस घर से पहले ही जा चुकी हूँ ।चाहती तो तुम्हारे आने से पहले ही चली जाती ,लेकिन इतने सालों तुम्हारी सोच से लडने के बाद यूँ जाना कायरता होती।तुम पूछ रहे हो ना क्या पाओगी, वो सब जो मैने खो दिया।मेरी मुसकान, मेरी स्वतन्त्रता, मेरा खुद पर हक ,मेरा आत्म विश्वास,मेरा अस्तित्व । आत्म विश्वास का मरहम लगाकर ही मैं वो सब वापस पा सकती हूं ।जिसकी कीमत तुम जैसा आदमी कभी नहीं समझ सकता।”एक लम्बी सांस लेते हुए जैसे सिया को उस मानसिक आजादी का सुकून ,नीरज को आईना दिखाते हुए ही महसूस हो रहा था।

सिया वहां से चली गयी ,नीरज हाथ में उन कागजों के साथ सोफे पर बैठ गया ,जैसे उस आईने में अपने वीभत्स चेहरे से वो खुद ही डर गया हो।

 

आज सिया की जिंदगी समाज में एक तलाकशूदा स्त्री के तौर पर कितनी भी संघर्षमयी क्य ना रही हो ।लेकिन इन वाह्य संघर्षों को वो अहमियत नहीं देते हुए आगे बढ रही है ।क्योकि वह अपने आन्तरिक संघर्षों से मुक्त है,जिसने सिया को एक ऐसी आंतरिक शक्ति दी जो उसे जिंदगी को अपनी शर्तो पर जीने की स्वतंत्रता देती है ।

 

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