आक्रोश – डाॅ संजु झा

वर्षों से  अन्तःस्थल में जज्ब किया हुआ दीनू का आक्रोश आज चरमसीमा पर था।दीनू वर्षों से श्यामचन्द के यहाँ मजदूरी करता आया है।जब वह छोटा था तो अपने पिता रामू के साथ श्यामचन्द के यहाँ आया करता था।पिता दिनभर उनके यहाँ मजदूरी करता और वह उनके घर के छोटे-मोटे काम कर दिया करता था।उसके एवज में उसे भरपेट खाना नसीब हो जाता था।दिनभर मजदूरी करने के बाद पिता उसे हाथ पकड़कर घर ले आता।उसके परिवार में माता-पिता के अलावे छः भाई-बहन थे।मजदूरी से रामू अपने परिवार का दोनों समय पेट नहीं भर पाता।बहुत गरीबी में परिवार गुजर रहा था।बच्चों को स्कूल  भेजना उसके लिए  दूर की कौड़ी लाने के समान था।

श्यामचन्द के घर के छोटे-मोटे काम करते हुए  दीनू कब पूर्ण मजदूर  बन बैठा,उसे पता ही नहीं चला।पिता रामू की मृत्यु के बाद वह श्यामचन्द के घर का स्थायी मजदूर  बन गया।समय के साथ  दीनू की शादी हो गई और दो बच्चे एक बेटी और एक बेटा हो गया।पढ़ाई  न कर पाने की टीस सदैव दीनू के मन में बनी रहती थी।उसने बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से परिवार और नहीं बढ़ाया।पति-पत्नी दोनों श्यामचन्द के घर मजदूरी करते और दोनों बच्चों को स्कूल भेजते।दीनू कभी-कभी अपनी अशिक्षा की कसक बताते हुए पत्नी से कहता -” निम्मो! ज्ञान और शिक्षा सिर्फ  बुद्धि में रहनेवाली वस्तु नहीं है,बल्कि नूर की बूँदें बनकर चेहरे से झलकती है।हम अपने दोनों बच्चों को खूब पढ़ाऐंगे।हमारे समय न तो परिवार  ने ,न ही सरकार ने हमारी सुधि ली,परन्तु हम दिन-रात मजदूरी कर बच्चों को खूब पढ़ाऐंगे।”

निम्मो पति की बातों से सहमत होते हुए कहती है-” हाँ !क्यों नहीं!अब तो सरकार भी गरीब बच्चों को पढ़ने में मदद कर रही है।”




उनकी बेटी गुलाबो चौदह साल की और बेटा हीरा ग्यारह साल का हो चुका था।किशोरावस्था में पहुँचते ही गुलाबो का रुप-यौवन निखर उठा।मानो गुलाबो के रुप में कीचड़ में कमल खिल उठा हो।मोहल्ले के शोहदे की नजरें गुड़ पर मक्खियों की भाँति उसके घर के पास भिनभिनाने लगीं।एक बार कुछ मनचले ने स्कूल से आते हुए गुलाबो का रास्ता रोकते हुए  कहा -“ऐ गुलाबों!कहाँ उस कँगले के घर अपनी जवानी बर्बाद कर रही हो?हमारे साथ चलो।तुम्हें रानी बनाकर रखेंगे।”

गुलाबो तेजी से दूसरे रास्ते से घर निकल गई। घर आकर भय से काँपते हुए उसने सारी बातें अपने पिता को बताई। उस दिन भी दीनू का आक्रोश उबल पड़ा था।वह डंडा लेकर घर से निकला औरअपने साथियों के सहयोग से  अंधाधुँध  उन मनचले की पिटाई कर दी।अब दीनू बेटी के लिए बहुत चिन्तित रहने लगा।खुद बेटी को स्कूल छोड़ आता और पत्नी उसे स्कूल से ले आती।फिर भी दीनू का दिल हमेशा आशंकित रहता।गरीब की बेटी का सुन्दर होना भी अभिशाप है।एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा -” निम्मो!जिस दिन गुलाबो की स्कूल की छुट्टी हो,उसदिन उसे मालिक श्यामचन्द के घर ले जाया करो।वहाँ वह महफूज रहेगी।

अब छुट्टी दिन गुलाबो श्यामचन्द के घर ही रहती।शाम में माँ के साथ वापस घर आ जाती।श्यामचन्द की पत्नी सुनयना देवी उसे बेटी के समान  प्यार करती।उनके दोनों बेटे बाहर पढ़ते थे।वे दोनों भी गुलाबों को बहन के समान प्यार करते।सुनयना देवी के जीवन में अकेलेपन का सूनापन अंधेरा छाया रहता।पति को उनकी भावनाओं से कोई मतलब नहीं रहता,दिन-रात बाहर के कामों में उलझे रहते।कभी-कभी अपने मन का दर्द व्यक्त करते हुए  कहती-“निम्मो! तू ही बता,जब कभी मैं बुखार से तप रही होती हूँ,तो पलभर खड़े होकर मेरा हाल-चाल तो पूछ सकते हैं!परन्तु नहीं,दुख तकलीफ में नितान्त अकेली पड़ जाती हूँ।कभी मन उदास होता है तो सोचती हूँ,क्या पैसा सिर्फ खुशियों की गारंटी है।मुझे हीरे -मोती की चाह नहीं है,बस चाहत है एक संवेदनशील पति की।”

निम्मो सुनयना देवी के सुख-दुख का हमराज बनती।अपनी सहानुभूति और अपनत्वपूर्ण व्यवहार से उनके दुखों पर मरहम लगाने की कोशिश करती।




कुछ दिन बाद सुनयना देवी फिर से बीमार हो गईं।श्यामचन्द काम के सिलसिले में बाहर गए हुए थे।दीनू पति-पत्नी दिनभर उनकी सेवा करते रहें।शाम में दीनू पति-पत्नी ने अपनी बेटी गुलाबो को उनके यहाँ छोड़ दिया और अपने घर चले आएँ।उन्हें सुनयना देवी के परिवार पर पूरा भरोसा था।

गुलाबो सुनयना देवी के पास बैठकर उन्हें दवा देकर धीरे-धीरे उनका  सिर सहला रही थी।दवा और सेवा से सुनयना देवी के चेहरे पर सुकून छाने लगी और वे निन्द्रा देवी के आगोश में समा गईं।गुलाबो ने भी सोचा -” काफी रात हो गई  है,

अब मैं भी थोड़ी देर के लिए  सो जाऊँ!”

उसी समय दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई।गुलाबो ने सोचा कि मालिक श्यामचन्द आ गए हैं।उसने झट से दरवाजा खोल दिया।शराब के नशे में श्यामचन्द का भतीजा  महेश घर के अंदर दाखिल हुआ। गुलाबो ने सुनयना देवी के जागने के कारण उसे शोर करने से मना कर दिया और उसे खाना परोसकर दे दिया।खाना खाते हुए  महेश गुलाबो को एकटक घूर रहा था।गुलाबो नजरें फेरकर सुनयना देवी के कमरे में चली गई और नीचे बिस्तर लगाकर सो गई। 

नींद में ही उसे किसी के  बदन का लिजलिजा-सा स्पर्श महसूस हु।वह घबड़ाकर उठ बैठी।जबतक वह शोर मचाती,तबतक महेश उसका मुँह बन्दकर उसे दूसरे कमरे में ले जा चुका था।हिरणी-सी मासूम गुलाबो सिंहरुपी महेश के चंगुल से छूटने की नाकाम कोशिश करती रही।महेश ने उसे शांत करने के लिए  उसकी नाक में कुछ सूँघाकर उसे बेहोश कर दिया और रातभर उसके जिस्म के साथ मनमानी करता रहा।सुबह-सुबह जब उसकी मूर्छा टूटी,तो उसे धीरे-धीरे रात की घटना याद आने लगी।महेश तो मुँह छुपाकर भाग चुका था।

उसी समय संयोग से गुलाबो के माता-पिता और श्यामचन्द भी आ चुके थे ।शोरगुल सुनकर सुनयना देवी भी धीमे कदमों से बाहर आ चुकी थीं।गुलाबो ने रो-रोकर अपनी आपबीती सबके सामने रखी।दीनू पति-पत्नी बेटी के साथ हुए बलात्कार से सदमे में आ गए। इस दर्दनाक  हादसे से उनका मन चीख रहा था.मन का आक्रोश जज्ब करने पर भी सुलग उठने को आतुर था।श्यामचन्द पति-पत्नी ने भी इस घटना की कल्पना नहीं की थी,फिर भी श्यामचन्द जी ने अपनी इज्जत बचाने और बात सँभालने की कोशिश करते हुए कहा -“दीनू!मेरी बात गौर से सुनो।जो हुआ उसके लिए  हमें बहुत दुख है,परन्तु अब फटा ढ़ोल पीटने से कुछ नहीं होगा।तुम्हें जितने पैसे चाहिए, उतने ले लो और गुलाबो की जल्द-से-जल्द  शादी कर दो।थाना-पुलिस करने से तुम्हारी ही बदनामी होगी।”

जिस दीनू  ने आजतक श्यामचन्द  के  सामने  कभी सिर नहीं उठाया,कभी ऊँची आवाज में बात तक नहीं की,वही दीनू आज बेटी की दुर्दशा देखकर आक्रोशित हो उठा।उसने ऊँचे स्वर में कहा-“श्यामचन्द!वर्षों की  सेवा का फल मुझे बेटी की इज्जत चुकाकर मिला।मेरी गरीबी का फायदा उठाकर आपने मेरी बेटी का सौदा करने को कहा।मैं मजदूर के रुप में जरुर मजबूर था,परन्तु मैं मजबूर बाप नहीं हूँ।मैं अपनी बेटी के बलात्कारी को जरुर जेल पहुँचकर रहूँगा।मैं पुलिस में रिपोर्ट  लिखाने जा रहा हूँ।हिम्मत है तो रोक लीजिए। “




आक्रोशित दीनू अपनी पत्नी और बेटी को लेकर पुलिस थाने गया।उसकी शिकायत पर पुलिस महेश को जेल ले गई। 

इतना सबकुछ  हो जाने के बाद  दीनू के परिवार  के लिए जीना आसान नहीं था।उन दर्दनाक यादों से अलग होना उसके परिवार के लिए  मुश्किल ही नहीं,नामुमकिन था,फिर भी हिम्मत बटोरकर दीनू अपने परिवार के साथ दूसरे शहर चला गया। घने कोहरे को चीरकर सुनहली धूप के समान  गुलाबो भविष्य के रेशमी धागे बुनने में सफल हुई।आज गुलाबो स्कूल  में शिक्षिका है,भाई काॅलेज में पढ़ रहा है।

सच कहा गया है कि अतीत का ढ़ोल पीटने से कुछ नहीं होता। विपरीत परिस्थितियों में साहस के साथ आगे बढ़ने का नाम ही जिन्दगी है।

समाप्त। 

लेखिका-डाॅ संजु झा(स्वरचित)

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