आजी  -कल्पना मिश्रा

उन सभी के चेहरों पर अपनों द्वारा ठुकराये जाने का दर्द साफ झलक रहा था।बचपन से अब तक तो बस सुनती ही आई थी कि ” बुढ़ापा अभिशाप होता है ..उस पर अपने ही शरीर के अंश द्वारा किया गया बुरा रवैया उन्हें अंदर तक तोड़ देता है।” ये आज “वृद्धाश्रम में रह रहे बुज़ुर्गो की मानसिक स्थिति” पर रिसर्च के दौरान उसने अपनी आँखों से देख भी लिया। ज़्यादातर वृद्धों की एक जैसी ही कहानी,एक ही जैसा दर्द था। कोई बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए मेहनत मजदूरी करके, अपना सर्वस्व लुटाकर भी इस उम्र में आश्रम में आया,तो कई वृद्ध घर में अथाह पैसा होने के बावज़ूद यहाँ रहने को मजबूर थे…क्योंकि उनके बच्चों के पास उनके लिए ना तो समय था और ना ही उनके अपने घर में कोई जगह। “आजी माँ, आप यहाँ कैसे आयीं?” उसने करीब अस्सी पचासी साल की वृद्धा से सवाल किया। बड़ी देर से वह देख रही थी कि सब तो बोल रहे थे…दुखड़ा सुनाकर,रोकर, क्रोध दर्शाकर अपने मन की भड़ास निकाल रहे थे ,

लेकिन वह गठरी सी बनी बैठी हुई चुपचाप शून्य में ताक रही थीं। उन्हें देखकर बरबस ही अपनी आजी माँ की याद आ गई| वैसी ही कदकाठी, वैसा ही झुर्रियोंदर चेहरा… पर ये चुप क्यों हैं?बोल ,सुन नही पाती हैं या बहू बेटे के दुर्व्यवहार की वजह से दिमाग में कुछ सदमा लगा है ?” उसके मन में उथलपुथल होने लगी। “आजी माँ बताइये,आप सुन रही हैं?” उसने दोबारा पूछा तो उन्होंने सिर उठाकर याचना भरी दृष्टि से देखा और बोल उठी “हमका छोड़ि के कहाँ चली गई रहेव बिटिया?” ” वो,,,वो,,,मैं तो,,, ” हकबका गयी वह। “बिटिया अपनी महतारी का कोउ घर से निकारत है का?” अपनी धोती के पल्लू से उन्होंने आँखों में भर आये आँसुओं को पोछा “हम तो अपना घर-बार, रुपइया,पइसा सब कुछ तुमरे नाम कर दियेन रहेन.. फिर काहे,,,,? पता है तुमका? हम केतना खोजेन तुमका? रात मा बहुत डेरु (डर) लागत रहा” कातर निगाहों से देखते हुए सहारे के लिए उन्होंने उसकी ओर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया तो उसे एक झटका सा लगा.. “नही,नही,,, ऐसा नही हो सकता! ऐसे कैसे कोई बेटी अपनी ही माँ को इतना दर्द दे सकती है,,,,इम्पॉसिबल”..वह धीरे से बुदबुदाई। “क्यों नही हो सकता है मैडम?

क्या ये झूठ बोल रही हैं? ” तभी पीछे बैठी वृद्धा गुस्से से बोल पड़ीं “देख रही हो? सदमा लगा है इन्हें! जिस बिटिया को फूलों से ज़्यादा प्यार दिया उसी ने,,,? ख़ैर… ये सब कहने की बातें हैं कि बेटियाँ बहुत प्यार करती हैं और बेटा,बहू जुल्म ढाते हैं,,, उन्हें तो बेकार ही बदनाम किया जाता है… हकीकत तो ये है कि बेटियाँ दूर रहती हैं और कभी-कभार ही मायके घर आती हैं, इसी वजह से वो प्यार करती हैं,,लेकिन माँ-बाप को बुढ़ापे में अपने साथ रखना पड़े तो वही बेटियाँ बहू से ज़्यादा निर्मम हो जाती हैं..” ओह्ह!!! नि:शब्द रह गयी वह। अब तक तो बेटियों का ममतामयी रूप देखा और सुना था….पर आज,,,,आज उनका ये नया चेहरा देख रही थी।
#दर्द
कल्पना मिश्रा कानपुर

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